जाने-अंजाने और बचपन में अपराध कर बैठे 414 किशोरों को सुनवाई न होने के कारण न्याय नहीं मिल पा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गठित हाईपावर कमेटी ने इस देरी पर गहरी नाराजगी जाहिर की है।
समिति किशोर न्याय अधिनियम के लंबित मामलों पर कठोर आपत्ति दर्ज करते हुए किशोर न्याय बोर्ड के न्यायाधीशों को चार महीने में सभी लंबित मामले निपटाने के निर्देश दिए हैं। साथ ही ताकीद किया है कि वर्ष 2012 के मामले एक महीने के भीतर निस्तारित हो जाने चाहिए।
बता दें कि वर्ष 2002 से 31 मार्च 2016 तक 414 से ज्यादा मामले लंबित थे। इनमें सबसे अधिक मामले हरिद्वार, देहरादून और नैनीताल जनपद के हैं। इनमें कुछ मामले वर्ष 2002 के भी हैं। पिछले दिनों नैनीताल उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति वीके बिष्ट की अध्यक्षता में बनी हाईपावर कमेटी ने किशोर न्याय अधिनियम के तहत दर्ज मामलों पर न्यायिक प्रगति की समीक्षा की।
समिति हैरान थी कि कई वर्ष पुराने मामलों पर भी निर्णय नहीं हो पाया था। जबकि नियमत: ऐसे मामलों में 14 महीने के भीतर निर्णय हो जाना चाहिए। माना गया कि अनिर्णय की स्थिति में परिजनों को मानसिक तनाव से होकर गुजरना पड़ा है। ऐसे प्रकरणों को शीघ्रता से निपटाने के लिए समिति ने किशोर न्याय बोर्ड के न्यायाधीशों को 15 अप्रैल से नियमित सुनवाई करने के निर्देश दिए। मामलों के निस्तारण के लिए 13 प्रधान मजिस्ट्रेट और दो सदस्य हैं।
52 किशोर निरुद्ध हैं
प्रदेश में अल्मोड़ा और हरिद्वार में विशेष गृह हैं। हरिद्वार में आपराधिक मामलों में निरुद्ध 22 किशोर बंद हैं। अल्मोड़ा विशेष गृह बालिकाओं के लिए है, जहां कोई मामला नहीं है। सात संप्रेक्षण गृहों में 52 किशोर हैं।
न्याय बोर्ड के जजों को निर्देश
- 15 अप्रैल से सुनवाई में जुटेंगे
- न्यायालय में बैठ कर नहीं निपटाए जाएंगे केस
- संप्रेक्षण व विशेष गृहों के आसपास जाना होगा
- सुनवाई के दौरान माहौल न्यायालय जैसा नहीं लगना चाहिए
- विशेष गृहों में वास कर रहे किशोरों के मामले में पुनर्विचार होगा
- जमानत के लिए जमानती की आवश्यकता नहीं होगी
- पैरवी के लिए निशुल्क विधि सहायता को सुनिश्चित बनाया जाएगा
‘रिफ्लेक्ट’ न हो बैड नेम
हाईपावर कमेटी के अध्यक्ष जस्टिस वीके बिष्ट ने निर्देश दिए कि सुधार गृहों में रह रहे किशोरों का ‘बैड नेम’ उनके आगे के जीवन पर ‘रिफ्लेक्ट’ नहीं होना चाहिए। इसलिए सुधार गृहों में गुजारे गए समय को ‘डिलीट’ कर दिया जाए। साथ ही उन स्कूलों पर सख्त कार्रवाई की जाए जो ऐसे बच्चों को दाखिला देने में हीलाहवाली करते हैं।
मुख्यधारा में लाने पर जोर
किशोर न्याय अधिनियम का मुख्य ध्येय सुधार गृहों से मुक्त किशोरों को समाज की मुख्य धारा जोड़ने का है। शासन को ये निर्देश दिए गए हैं कि वह सुनिश्चित करें कि ऐसे बच्चों और किशोरों के दाखिले को लेकर कोई स्कूल हीलाहवाली न करे। ऐसे किशोरों को दाखिला देने में आनाकानी करने वाले स्कूलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए।
सबसे ज्यादा मामले हरिद्वार, देहरादून और यूएसनगर में
किशोर अपराध से जुड़े 400 से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें सबसे ज्यादा 104 मामले हरिद्वार में हैं। ऊधम सिंह नगर में 94, देहरादून में 83, नैनीताल में 72 मामलों पर कोर्ट निर्णय नहीं कर पाया है। इनके अलावा अल्मोड़ा में तीन, बागेश्वर में नौ, चंपावत में एक, पिथौरागढ़ दो, रूद्रप्रयाग में तीन, टिहरी में 14 व उत्तरकाशी में पांच मामले लंबित हैं।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर सभी राज्यों में एक समिति गठित है। समिति ने पिछले दिनों किशोर न्याय अधिनियम के तहत मामलों की समीक्षा की और आवश्यक दिशा-निर्देश दिए हैं। समिति ने फैमिली कोर्ट से जुड़े लंबित मामलों में कार्रवाई करने को कहा है।
- मनोज चंद्र, अपर सचिव, समाज कल्याण