रिकॉर्ड घोषणाएं और वित्तीय अनुशासन न होने के चलते उत्तराखंड राज्य 407 अरब रुपये का कर्जदार हो गया है। स्थिति यह है कि रिजर्व बैंक से इसी माह एक हजार करोड़ रुपये का कर्ज और लिया गया है। इसके बाद कर्ज लेने की अधिकतम सीमा भी बहुत ज्यादा शेष नहीं है।
कर्ज की राशि उत्तराखंड के गठन के बाद से बढ़कर दस गुना हो गई है। उत्तराखंड को कर्ज के इस दलदल में इस तरह घकेलने में कुछ कम-ज्यादा सभी सरकारों का रोल रहा है, लेकिन रावत सरकार ने पिछले दो महीने के भीतर ही इस कर्ज में डेढ़ हजार करोड़ का इजाफा कर दिया।
वित्त विभाग के रिकॉर्ड के मुताबिक अक्टूबर महीने में पांच सौ करोड़ और नवंबर महीने में एक हजार करोड़ रुपए का ताजा कर्ज लिया गया है। राजस्व के मामले में अपेक्षित वृद्धि न होने और वेतन-भत्ते के खर्च बढ़ने से यह स्थिति और भयावह होती जा रही है।
एक वर्ष में 3500 करोड़ बढ़ गया बजट
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उत्तराखंड के राजस्व लेखे पर नजर डालें तो वित्तीय वर्ष 14-15 में वेतन के मद में 7660 करोड़ रुपये का खर्च हुआ था, जो इस साल लगभग 3500 करोड़ बढ़कर 11029 करोड़ पहुंच चुका है। तीन साल बाद यानी 19-20 में फिर इतनी ही वृद्धि होने का अनुमान है।
जो कर्ज सरकार के ऊपर है, उसके ब्याज के रूप में वर्ष 14-15 में 2405 करोड़ रुपये अदा किए गए, जबकि चालू वित्तीय वर्ष में यह बढ़कर 3881 करोड़ रुपये हो चुका है।
कर्ज की बात की जाए तो राज्य गठन के वक्त यानी वित्तीय वर्ष 2001-02 में जहां मात्र 44 अरब रुपये का कर्ज था, वह अब बढ़कर 407 अरब रुपये का हो चुका है। नवंबर माह में लिए गए एक हजार करोड़ के कर्ज मिलने के बाद तमाम योजनाओं और घोषणाओं के अलावा विभिन्न मदों में होने वाले भुगतान अदा होने शुरू हुए हैं, जो लगभग महीने भर से अटके थे।
सातवें वेतन आयोग से और बढ़ेगा भार
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अभी सातवें वेतन आयोग का लाभ देने का काम भी बाकी है, जिस पर करोड़ों का व्यय भार आने वाला है। वर्तमान में साढ़े तीन हजार के करीब घोषणाएं, जिन्हें पूरा करने के लिए सरकार बार-बार कर्ज ले रही है, को भी वित्तीय मामलों से जुुड़े जिम्मेदार लोग व्यय भार बढ़ाने के लिए खास तौर पर जिम्मेदार ठहराते हैं।
खर्च कम करने की जरूरत
बीते दो महीने में रिजर्व बैंक से डेढ़ हजार करोड़ रुपए का कर्ज लिया जा चुका है, फिर भी हम रिजर्व बैंक द्वारा निर्धारित अधिकतम कर्ज सीमा के भीतर हैं। निश्चित रूप से नान प्लान खर्चें (वेतन भत्ते और ब्याज आदि) कम करने की जरूरत है। डेवलपमेंट प्रोजेक्ट के लिए खर्चे बढ़ाने की जरूरत है। विमुद्रीकरण (नोटबंदी) का असर राजस्व प्राप्ति के लक्ष्यों पर अवश्य पड़ेगा। इससे निपटने के रास्ते तलाशने होंगे।
-अमित सिंह नेगी, सचिव वित्त, उत्तराखंड