ब्यूरो/अमर उजाला, रुड़की
आने वाले दिनों में बहते पानी की सतह पर मिलने वाले वेग से टरबाइन घुमाकर बिजली पैदा की जाएगी। ऐसा संभव होगा आईआईटी की बेहद आसान और बहते पानी की व्यवहारिक स्थिति के अनुरूप बिना बांध बनाए बिजली बनाने की तकनीक से। संस्थान की लैब में करीब दो वर्षों के अनुसंधान के बाद तैयार किए गए मॉडल के परीक्षण के लिए गंगनहर में संयंत्र स्थापित करने का काम शुरू हो गया है।
आईआईटी रुड़की के अल्टरनेटिव हाइड्रो एनर्जी सेंटर (एएचईसी) की ओर से सरफेस हाइड्रो काइनेटिक टरबाइन स्थापित करने की कवायद शुरू हुई है। शोध से जुड़े वैज्ञानिक डॉ. आरपी सिंह ने बताया कि टरबाइन घूमने से बिजली बनती है। इसके लिए अभी हमें ऊंचाई से गिरने वाले पानी की आवश्यकता होती है। पहाड़ों पर डैम बनाकर बिजली के संयंत्र स्थापित करने पड़ते हैं, लेकिन इसके वैकल्पिक समाधान के लिए संस्थान में दो साल पहले शुरू किए शोध से बहते पानी की गति और उसकी ताकत से घूमने वाली टरबाइन तैयार की गई है।
साथ ही एक मॉडल विकसित किया गया है, जो इस टरबाइन की मदद से नदी और नहरों के पानी से ऊर्जा पैदा करेगा। सतह पर पानी के वेग से टरबाइन घूमेगी और फिर जनरेटर की मदद से बिजली का उत्पादन किया जाएगा। मॉडल के तौर पर यह संयंत्र गंगनहर में सोलानी पार्क के समीप स्थापित किया जा रहा है। उत्तराखंड जल विद्युत निगम की ओर से प्रायोजित इस प्रोजेक्ट में दिल्ली की मैकलैक कंपनी इंडस्ट्रीज पार्टनर है। डॉ. आरपी सिंह ने बताया कि देश में किए गए इस तरह के प्रयोगों में से यह अपने आप में अलग तरह का प्रयास है। प्रारंभिक तौर पर हमें इससे बिजली बनाने में सफलता मिली है। अल्टरनेटिव हाइड्रो एनर्जी सेंटर ने गंगनहर में संयंत्र लगाने का काम शुरू कर दिया है।
मिशन सफल हुआ तो मिलेगी बांधों के खतरों से निजात
बांध बनाकर बिजली पैदा करने के पारंपरिक तरीके से पर्यावरण संतुलन को खतरा होने आशंका बनी रहती है। विज्ञान की दृष्टि से पानी के व्यवहार के अनुरूप बिना कोई अवरोध उत्पन्न किए बिजली पैदा करने का तरीका पर्यावरण के अनुकूल होगा। यदि यह मॉडल सफल होता है तो आने वाले समय में बांधों से होने वाले खतरों से भी निजात मिल सकती है। वैज्ञानिक प्रो. आरपी सैनी ने बताया कि बिजली बनाने का यह तरीका पर्यावरण के अनुकूल होगा।