मूल निवास प्रमाणपत्र भी एक भावनात्मक मुद्दा है। अपना अलग राज्य बनाने के लिए लोगों ने लंबा संघर्ष किया है। यातनाएं झेलीं और जान भी दी। ऐसे में उसे लंबे समय तक दबाकर नहीं रखा जा सकता है। इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि नए राज्य के गठन की विकास यात्रा में यहां के मूल निवासियों के साथ ऐसे लोग भी हैं जो राज्य गठन के पहले से और बाद में स्थायी रूप में जुड़े हैं।
इसका समाधान भी जल्द सरकार और विपक्ष को निकालना होगा। वर्तमान विधायकों में मुन्ना सिंह चौहान, बंशीधर भगत, बिशन सिंह चुफाल, तिलक राज बेहड़ यूपी के उस सदन के साक्षी हैं, जब अलग राज्य के गठन की नींव पड़ी। 25 साल बाद ये चेहरे उत्तराखंड सदन में दिख रहे हैं। इन विधायकों के साथ मैदान से पहाड़ तक सभी विधायकों को मिल बैठकर ऐसे मुद्दों का समाधान कर लेना चाहिए, जो आपस में विषवमन कराते हैं।
विशेष सत्र में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राज्य की विकास यात्रा पर दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर अपनी बात रखी है। देवभूमि की आध्यात्मिक और शौर्य परंपराओं को इस छोटे राज्य की ताकत बताया है लेकिन आने वाले 25 वर्षों में युवा राज्य के सामने चुनौतियों की आत्म समीक्षा की ओर भी इशारा किया है। ऐसे में इस विशेष राज्य के पास आपदा, बाढ़, भूस्खलन, भूधंसाव जैसी विषम परिस्थितियों के बीच अमृत के रूप में नदियां और प्राकृतिक धरोहर वाला चार दांत का ऐरावत हाथी है।
पर्यटन व तीर्थाटन के रूप में कामधेनु गाय है। हमारी धार्मिक विरासत, संस्कृति और परंपराओं वाला पांचजन्य शंख है, जो दुनिया भर में नाद करता है। अकूत संपदाओं का कल्पवृक्ष है जो आने वाली पीढ़ी की इच्छाएं पूरी करने में समर्थ है। विकास यात्रा के लिए मंथन जरूरी है लेकिन आने वाले उत्तराखंड को अमृतपान के साथ ही उस विष से भी दूर रखना होगा जो उत्तराखंडियत को नुकसान पहुंचा सकता है।