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17 साल पहले आज ही संसद हमले में शहीद हुआ था उत्तराखंड का लाल, ऐसे फेरा आतंकियों के मंसूबों पर पानी

Thu, 13 Dec 2018 10:03 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पौड़ी
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मातबर सिंह नेगी
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आज के ही दिन ठीक 17 साल पहले संसद हमले को नाकाम करने में अपने प्राणों की आहुति देने वाले मातबर सिंह नेगी की जन्मस्थली सासौं गांव को सरकार भूल गई।

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शहीद मातबर को उनकी वीरता के लिए केंद्र सरकार ने अशोक चक्र से सम्मानित किया, लेकिन राज्य सरकार घोषणा करके भूल गई। शहीद के बेेटे गौतम ने कहा कि आज तक शासन-प्रशासन का कोई प्रतिनिधि उनके पिता को श्रद्धांजलि देने गांव नहीं पहुंचा। यह कहते हुए वह भावुक हो गए।

आज बृहस्पतिवार को संसद हमले की बरसी है। 13 दिसंबर 2001 को जब देश की संसद पर आतंकवादियों ने हमला किया था, तब गेट नंबर 2 पर तैनात विकासखंड एकेश्वर की मवालस्यूं पट्टी के सासौं निवासी मातबर सिंह नेगी ने मुस्तैदी दिखाते हुए गेट को बंद कर दिया था। इस गेट से कुछ देर बाद तत्कालीन उपराष्ट्रपति कृष्णकांत आने वाले थे।
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गेट बंद करते समय आतंकवादियों की एक गोली मातबर को लग गई और अस्पताल में मातबर ने अंतिम सांस ली। मातबर के शहीद होने पर नेताओं ने स्मारक बनाने से लेकर शहीद के गांव का विकास करने और क्षेत्र में शहीद के नाम पर आईटीआई व महाविद्यालय खोलने सहित कई घोषणाएं की थी,  लेकिन 17 साल गुजरने के बाद भी एक भी घोषणा पूरी नहीं हुई।

आज भी शहीद की जन्मभूमि काणी मवालस्यूं (उपेक्षित) के नाम से जानी जाती है। शहीद के बेटे गौतम नेगी बताते हैं कि आज तक शासन-प्रशासन का कोई भी प्रतिनिधि उनके पिता को श्रद्धांजलि देने गांव नहीं पहुंचा।

सामाजिक कार्यकर्ता सुरेंद्र रावत व मनोज बिष्ट बताते हैं कि राज्य सरकार यदि शहीद की शहादत की सुध लेती, तो क्षेत्र में आईटीआई या महाविद्यालय ही शहीद के नाम पर खोल देती। जिस स्कूल से मातबर पढ़े, वह स्कूल भी बुरी हालत में है।  

क्या हुआ था उस दिन...

13 दिसंबर 2001 यह दहशत की वह तारीख है जिस दिन भारतीय लोकतंत्र का मंदिर कहे जाने वाली संसद में जैश ए मोहम्मद के आतंकियों ने हमला किया था। इस हमले को आज 17 साल बीत हो चुके हैं।

हालांकि संसद को देश की सबसे सुरक्षित जगहों में से एक माना जाता है, लेकिन आतंकियों ने इसे भी अपना निशाना बनाया था। आईए जानते हैं दहशत के वो पल जब आतंकियों के फायरिंग के जवाब में संसद परिसर में मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने भी गोलीबारी शुरू कर दी थी।

13 दिसंबर संसद पर हमला हुआ था, पांच आतंकी संसद परिसर में घुस आए थे। उन्होंने 12 लोगों की जान ले ली थी और 15 लोग घायल हो गए थे।

 

गिलानी को दिल्ली हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था

15 दिसंबर को इस मामले में दिल्ली पुलिस ने अफजल गुरु, शौकत हसन और प्रोफेसर एस ए आर गिलानी को गिरफ्तार किया गया था।

25 दिसंबर को हमले के तार मसूद अजहर से जुड़ने के बाद पाकिस्तान ने उसकी औपचारिक गिरफ्तारी की थी।

18 दिसंबर 2002 को मामले की सुनवाई कर रही ट्रायल कोर्ट ने इसी दिन अफजल गुरु, शौकत हसन और गिलानी को मौत की सजा देने का एलान किया था।

29 अक्टूबर 2003 को गिलानी को दिल्ली हाईकोर्ट ने बरी कर दिया था, वहीं बाकी दोनों की सजा को सही ठहराया गया था।
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अफजल गुरु को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी

4 अगस्त 2005 को मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच चुका था, वहां हसन की सजा को दस साल कर दिया गया, लेकिन अफजल की फांसी को उन्होंने भी बरकरार रखा था। अफजल गुरु ने उसे मिली सजा ए मौत पर रिव्यू पिटीशन दायर की थी, जिसे 12 जनवरी 2007 को खारिज कर दिया गया था।

9 फरवरी 2013 के दिन अफजल गुरु को तिहाड़ जेल में फांसी दे दी गई थी। मुठभेड़ में सभी आतंकी मारे गए लेकिन वहीं 12 जवान भी इस हमले में शहीद हुए थे। बता दें कि जिस वक्त संसद पर हमला हुआ उस समय कुछ नेता अपने घरों के लिए निकल गए थे लेकिन कुछ संसद भवन में ही मौजूद थे।
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