अमर उजाला से खास बातचीत में मयंक ने बताया कि जब उनके पिता शहीद हुए तो उनकी उम्र महज सात साल थी। तब उन्हें ज्यादा समझ नहीं थी लेकिन धीरे-धीरे वह बड़े होते गए तो आस पास के लोगों से पिता की शहादत और उनके शौर्य के किस्से सुनने को मिलते थे।
जिस पर उन्होंने पिता की राह पर चलते हुए फौज में जाने का निर्णय लिया। वर्ष 2012 में वह बीबीए कर रहे थे। इस दौरान उन्हें बनारस में फौज में भर्ती निकलने की सूचना मिली। जिसके बाद वह पढ़ाई बीच में छोड़ बनारस जा पहुंचे। जहां पहले ही प्रयास में वह फौज में शामिल हो गए।
शहीद की पत्नी मीरा थापा का कहना है कि जब पति के शहीद होने की सूचना मिली तो उनके दोनों बेटे बहुत छोटे थे। पति के जाने के बाद उनका सारा जीवन संघर्ष में बीता। इस दौरान हमेशा अपने बच्चों को पिता की राह पर चलने की सीख दी। जिसका नतीजा यह है कि आज उनका बड़ा बेटा फौज में हैं जबकि, छोटा बेटा करन थापा घर पर रह कर व्यवसाय और मां की सेवा कर रहा है।
देश के वीप सपूत नायक कृष्ण बहादुर थापा का जन्म 24 जून 1964 में सेलाकुई निवासी मोहन सिंह थापा के घर पर हुआ था। हाईस्कूल पास करने बाद वह गोरखा रेजीमेंट में भर्ती हो गए। ऑपरेशन विजय के दौरान बटालिक सेक्टर को मुक्त कराते हुए वह 11 जुलाई 1999 को शहीद हो गए थे।