ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
काश सत्येश्वर शर्मा को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा तीन माह पहले मिल गया होता तो मौत पर उन्हें वह ‘सम्मान’ जरूर मिलता, जिसके लिए उन्होंने 35 वर्षों तक लड़ाई लड़ी। यह कहना है कि सत्येश्वर शर्मा के पोते उदित का, जो उनकी इस लड़ाई में पूरी शिद्दत से साथ निभाते रहे। पिछले करीब आठ वर्षों से उदित ही अपने दादा की इस लड़ाई को लड़ रहे थे।
बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट ने सत्येश्वर शर्मा को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी मानते हुए उनकी पत्नी को पेंशन समेत अन्य लाभ देने के निर्देश दिए। साथ ही राज्य सरकार पर साढ़े तीन लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया था। कोर्ट के इस फैसले से उनके पूरे परिवार को खुशी तो है, लेकिन अफसोस भी। उनका मानना है कि अगर तीन माह पहले कोर्ट का यह फैसला आता तो सत्येश्वर शर्मा उस गर्व और सम्मान के साथ अंतिम यात्रा पर रवाना हो सकते थे, जिसके लिए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया।
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सत्येश्वर शर्मा
त्यागी रोड निवासी सत्येश्वर शर्मा को 1942 के असहयोग आंदोलन के दौरान भारतीय ध्वज फहराने के आरोप में 45 दिन की जेल काटनी पड़ी। आंदोलन में भाग लेने के कारण डीएवी स्कूल ने उन्हें रेस्टिकेट कर दिया। हालांकि, इससे शर्मा पर कोई खास असर नहीं पड़ा और वह लाहौर से क्रांतिकारियों का साहित्य दून पहुंचाने के काम में लगे रहे। साथ ही वह आंदोलनकारियों के अखबार ‘ढिंढोरा’ को दून के घर-घर तक पहुंचाने में भी जुटे रहे। आजादी के बाद वह शिक्षा के क्षेत्र में चले गए। 1960 से 78 तक वह एसजीआरआर इंटर कॉलेज नेहरू ग्राम के प्रधानाचार्य रहे। रिटायरमेंट के बाद उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का दर्जा पाने के प्रयास शुरू किए। उस दौर के फोटो, जेल जाने की रिपोर्ट समेत अन्य सूचनाओं से जुड़े दस्तावेज लेकर एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर तक चक्कर काटते रहे। बाद में चलने-फिरने में असमर्थ हुए तो उनके पोते उदित नेताओं और अधिकारियों के दर पर भटकते रहे। लगभग सभी मुख्यमंत्री और अधिकारी प्रकरण में जल्द कार्रवाई का आश्वासन देते रहे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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22 नवंबर 2017 को हुआ निधन
22 नवंबर 2017 को तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां से चिकित्सकों ने उन्हें घर ले जाने की सलाह दी। घर पर ही उन्होंने आखिरी सांस ली। उनके पुत्र राकेश नारायण शर्मा ने उन्हें मुखाग्नि दी। वह अपने पीछे पत्नी राजेश्वरी शर्मा (90), बेटा, बहू, तीन बेटियां और दो पोते छोड़ गए।
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वह जीवन भर सम्मान के लिए लड़ते रहे। बाद में जब चलने में असमर्थ हो गए तो पोता उदित उनका साथ देता रहा। 12-13 वर्ष की उम्र से वह दादा के साथ मंत्रियों और अधिकारियों के यहां जाने लगा। बाद में हर मंत्री-अधिकारी की चौखट पर गया और अकेले लड़ाई लड़ी। अंतिम समय में जब वह हिम्मत हारने लगे तो उदित ने उन्हें और पूरे परिवार को हिम्मत बंधाई।
-राजेश्वरी शर्मा, स्व. सत्येश्वर शर्मा की धर्मपत्नी