ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून।
आत्माराम धर्मशाला देहरादून में आयोजित विचार गोष्ठी में मुख्य वक्ता विश्व संवाद केन्द्र के निदेशक विजय कुमार ने कहा कि जो दर्द आज कश्मीर के लोग झेल रहे हैं, जो दर्द उनके दिल में है वह केवल उनका दर्द न रहे यह दर्द पूरे देश के लोग जाने और यह पूरे भारत का दर्द बने।
उन्होंने कहा कि देश का विभाजन 1947 में हुआ और कश्मीर से विस्थापन 1990 में हुआ, लेकिन दोनों में मूलभूत अंतर यह था कि विभाजन के वक्त लोगों को पता था हमें अपना स्थान अपना घर छोड़ना है और फि र हम वहाँ कभी नहीं लौटेंगे, लेकिन जब कश्मीरी हिंदुओं का विस्थापन हुआ तो उन्हें यह पता नहीं था कि वह यहाँ वापस नहीं आयेंगे वह इस आशा से अपने घरों में ताला लगाकर आये कि वह दोबारा वापस अपने घर आयेंगे, लेकिन आज तक वे अपने घर वापस न जा सके। उन्होंने कश्मीर के इतिहास के बारे में बताते हुए कहा कि कश्मीर पहले भारत में शिक्षा, ज्ञान और संस्कृति का प्रसिद्ध केन्द्र था। जिस कारण यहाँ के लोगों को पण्डित कहा जाता है। जो अब कश्मीरी पण्डितों के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने बताया कि प्राचीन काल से ही कश्मीर में इस्लामी प्रभाव बढ़ने का सबसे बड़ा कारण हिंदु ही रहे हैं। कार्यक्रम के संयोजक डा. सूरज कुमार पारचा ने कार्यक्रम की शुरूआत करते हुए कहा कि कश्मीर आज केवल कश्मीर के लोगों की समस्या नहीं है बल्कि पूरे देश की समस्या है जिसको हम सबको जानना और समझना होगा।
जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के संयोजक सुशील ने कहा कि जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र का आरम्भ 2010 में हुआ। जिसकी दिल्ली और जम्मू में शाखाएं हैं जो देश में जम्मू कश्मीर के विषय में गहराई से जानकारी एकत्रित कर देश में सभी लोगों तक पहुंचाने का कार्य कर रहा है। कार्यक्रम की अध्यक्षता अवकाश प्राप्त अधिकारी ओएनजीसी निश्चिन्त दत्ता ने की। कार्यक्रम में विश्व संवाद केन्द्र के अध्यक्ष सुरेन्द्र मित्तल, बलदेव परासर, नीरज मित्तल, रंजीत ज्याला, विशाल जिंदल, सिद्धार्थ, संजय, सरबजीत, हिमांशु अग्रवाल, रीता गोयल, अनुराधा सिंह, प्रतिभा जायसवाल, शारदा गुप्ता, सतेन्द्र, प्रजातन्त्र, सुनील शाह आदि मौजूद रहे।