ब्यूरो/अमर उजाला/देहरादून।
राज्य के पर्वतीय इलाकों में तेजी से सूख रहे झरनों को पुनर्जीवित के उद्देश्य से तकनीकी सर्वे का काम पूरा कर लिया गया है। योजना के पहले चरण में पर्वतीय इलाके के सभी वन प्रभागों के 10-10 झरनाें को पुनर्जीवित किया जाएगा। इसके लिए जल्द ही कोर कमेटी की बैठक बुलायी जाएगी।
प्रमुख वन संरक्षक जयराज के मुताबिक उत्तराखंड समेत देश के सभी हिमालयी राज्यों में प्राकृतिक झरने तेजी से सूख रहे हैं। इसकी वजह से सभी पर्वतीय राज्यों में पानी की किल्लत साल दर साल तेजी से बढ़ रही है। हालांकि लोगों को पानी की किल्लत से निजात जाने के लिए तमाम राज सरकारों की ओर से कई योजनाएं लागू की गई हैं, लेकिन अभी भी लोगों को इस विकट समस्या से निजात नहीं मिल पायी है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ अल्मोड़ा में ही पिछले 150 साल में 300 बड़े झरने पूरी तरह सूख चुके हैं। प्रमुख वन संरक्षक जयराज का कहना है कि योजना के पहले चरण में 221 झरनों को रिचार्ज करने की तैयारी है। इस पर वन विभाग 20 करोड़ रुपये खर्च करेगा। योजना को धरातल पर उतारने के लिए राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रुड़की, आईआईटी रुड़की समेत देश के कई तकनीकी संस्थानों के विशेषज्ञों की भी मदद ली जा रही है।
पानी की कमी से हो रहा पलायन
पर्वतीय इलाकों में प्राकृतिक जलस्रोतों की सूखने की वजह से पलायन भी तेजी से बढ़ा है। ऐसे में यदि झरनों को नए सिरे से रिचार्ज किया जाता है तो ना सिर्फ पलायन को रोका जाएगा वरन सामरिक दृष्टिकोण से भी कई फायदे होंगे। पलायन आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य के पर्वतीय इलाकाें से हो रहे पलायन की कई वजहें हैं, लेकिन इनमें पानी की समस्या अहम है।