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चूल्हे चौके से मिला मुकाम, टिफिन सर्विस ने दी पहचान
-टिफिन के जायके से चमकी महिलाओं की किस्मत
-बोली महिलाएं, हुनर के लिए डिग्री की नहीं जरूरत
-अमर उजाला अपराजिता अभियान के तहत किया गया संवाद का आयोजन
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। जरूरी नहीं है यदि आप पढ़ी लिखी हैं तभी कमा सकती हैं और अपनी पहचान बना पाएंगी। अपने हुनर से भी आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान की कहानी बन सकती हैं। शहर की ऐसी ही कई महिलाओं ने चूल्हे चौके को ही व्यवसाय का जरिया बनाया और उनकी तकदीर बदल गई।
अमर उजाला अपराजिता 100 मिलियन स्माइल्स अभियान के तहत शनिवार को अमर उजाला पटेलनगर कार्यालय में ‘टिफिन सर्विस एक रोजगार’ विषय पर संवाद का आयोजन किया गया। संवाद में कई ऐसी महिलाएं पहुंचीं जिन्होंने टिफिन सर्विस को आय का जरिया बनाया और कामयाबी हासिल की।
टिफिन सर्विस का काम कर रही सुजाता सिंह और ममता गर्ग ने बताया कि शुरुआत में कुछ परेशानी जरूर हुई, लेकिन आज वह अच्छा कमा रही हैं। ओएनजीसी से एचआर मैनेजर (रिटायर्ड) सरिता रानी (60) का कहना है कि खाना बनाना और खिलाने का शौक है। अपने इस हुनर को दूसरों के भी काम लाना चाहती हैं। सुमन डोभाल ने कहा कि उनके खाने की तारीफ घर में आने वाला हर मेहमान करता है, लेकिन अब वह इसे एक रोजगार के रूप में करना चाहती हैं। सामाजिक कार्यकर्ता मंजू जैन, रमा गोयल ने कहा कि महिलाओं के भीतर कई हुनर होते हैं। इनके इस्तेमाल से घर बैठे ही स्वयं की पहचान बना सकती हैं। इस मौके पर निधि सेमवाल, दिपाली, सिम्मी जैन, रजनी जैन, मनजीत, नीतू, बिश्नुप्रिया, सविता वर्मा, स्वीटी, विमला गौड़, अमृता अग्रवाल, रोशनी रतूड़ी और विमला उनियाल आदि मौजूद रहीं।
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ममता की चपातियों के स्वाद का हर कोई कायल
-10वीं ममता ने कई लोगों को दिया रोजगार
अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। सिर पर दो बच्चों की परवरिश और आर्थिक तंगी की मार। ममता गर्ग (51) को इस समस्या से निकलने के लिए रोजगार का रास्ता निकालना था। इस दौरान ममता ने देखा पीजी में पढ़ने वाले बच्चे मजबूरी में किसी भी तरह का खाना खा रहे हैं, जबकि पैसा पूरा देते हैं। बस ममता ने टिफिन सप्लाई करने की ठानी और एक टिफिन से शुरू हुआ काम अब 250 तक पहुंच गया है। ममता का दावा है कि उनके हाथ की बनीं चपातियों का हर कोई कायल हो जाता है। ममता बताती हैं कि वह एक दिन हजार-हजार चपातियां बनाती थीं। काम बढ़ने लगा तो हेल्पर रख लिए।
घर चलाने के लिए शुरू की टिफिन सर्विस
पटेल नगर निवासी सुजाता सिंह ने बताया कि टीचिंग की थी, लेकिन शादी के बाद नहीं कर पाईं। कुछ समय बाद आर्थिक तंगी के चलते काम की जरूरत महसूस हुई। इसलिए 2005 में टिफिन सर्विस शुरू करने की सोची। शुरुआत पीजी में रहने वाले बच्चों को खाना खिलाने से की।
पहले लगाती थीं स्टॉल, आज खुद का है कैफे
रोजी कौर (31) ने नेपाल से एचएम की पढ़ाई की। खाना बनाने का शौक तो था, लेकिन करियर के रूप में लंबे समय तक जारी नहीं रख पाईं। शादी के बाद बच्चे की जिम्मेदारी के कारण करियर में पांच साल का गैप आ गया और नौकरी नहीं मिल पाई। इसलिए घर से काम शुरू करने की ठानी। पति का सहयोग मिला और खाने का स्टॉल लगाना शुरू कर दिया। काम अच्छा चला और आज खुद का कैफे है।
पारंपरिक खाने से मिला रोजगार
वर्ष 2003 से पूजा सुब्बा ने टिफिन सर्विस शुरू की थी। काम बहुत सफल रहा। इसके बाद अन्य महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की सोची। इसके लिए सबकी सहेली फाउंडेशन ट्रस्ट से महिलाओं को जोड़ा। अब हमें शादियों ट्रेडिशनल (पारंपरिक) खाने के आर्डर मिलते हैं।
बेटे बन गया फूड ब्लागर
नूपुर गुप्ता खुद तो अच्छी कुक हैं ही, उन्होंने अपने बेटे को भी अच्छी कुकिंग सिखाई। आज उनका बेटा जाना माना फूड ब्लागर है। नूपुर बताती है कि बेटा पेशे से इंजीनियर है, लेकिन फूड ब्लागिंग उसका पैशन है।
व्हाट्सएप ग्रुप पर साझा करेंगी रेसिपी
टिफिन सर्विस का काम कर रहीं महिलाएं और काम करने की इच्छुक महिलाओं को अधिकाधिक घर में पहुंचने में आसानी हो, इसके लिए व्हाट्सएप ग्रुप बनाया गया है। महिलाएं अपनी रेसिपी को इस ग्रुप में साझा करेंगी।
ऐसे करें लाइसेंस के लिए आवेदन
टिफिन सर्विस के लाइसेंस के लिए एफएसएसएआई की वेबसाइट पर ऑनलाइन आवेदन किया जा सकता है। वेबसाइट पर सबसे पहले यूजर आईडी और पासवर्ड बनाना होता है। इसके बाद व्यापार का प्रकार, फिर खाने का प्रकार आदि विकल्प आएंगे। इसके बाद इसमें ऑनलाइन ही फीस ट्रांसफर करने का विकल्प आएगा। सभी फीस आदि जमा होने के बाद लाइसेंस स्वीकृति का लेटर मिल जाएगा। एफएसएसएआई की वेबसाइट www.fssai.gov.in है।