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गंगभेवा बावड़ी में मेले की तैयारियां शुरू

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ब्यूरो/अमर उजाला, विकासनगर
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गौतम ऋषि की तपस्थली कहलाने वाले गंगभेवा बावड़ी में चार दिवसीय वैसाखी मेले की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। आधुनिक चकाचौंध के बावजूद इस मेले की पौराणिकता अभी भी बरकरार है। यहां बिकने वाले अधिकतर उत्पाद कुटीर उद्योग के होते हैं।
शनिवार को यहां आए व्यापारियों ने दुकानों की जगह तलाशी। जबकि, नौनिहालों के लिए मनोरंजन के साधन भी लगने शुरू हो गए हैं। वैशाखी (14 अप्रैल) से लगने वाला बावड़ी का मेला आज भी गरीब मजदूर वर्ग के ग्रामीणों के लिए रोजमर्रा की वस्तुएं खरीदने का माध्यम बना हुआ है। मेले की शुरुआत कई दशक पूर्व हुई थी। मेले में गर्मी में उपयोग होने वाली वस्तुएं ही अधिकतर बिकती हैं। मुख्य रूप से मेले में घड़े, बांस के बने पंखे व फसल काटने के औजारों की बिक्री की जाती है। यूपी के जिला सहारनपुर के जंजोली, बुबका, शेरपुर, सलेमपुर गांव के कुम्हार मेले में मिट्टी के घड़े, मटका, कछाली, सुराही, गुल्लक आदि बेचने आते हैं। वहीं, सेलाकुई के शिल्पी गांव के ग्रामीण मेले में बांस के बने पंखे बेचते हैं। अधिकांश जगहों पर गेहूं की फसल काटने की शुरुआत वैशाखी से की जाती है। इसलिए इस मेले में फसल काटने के औजार की बिक्री भी बहुत होती है। मेले में बेहट के लोहार वर्षों से फसल काटने के औजार दरांती, पाठल, डांगरा, गडासा, हंसिया, कुदाल आदि बेचते हैं।
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मेले में दुकान के लिए जगह तलाश रहे लोहार गोपाल ने बताया कि वह वर्षों से मेले में दुकान लगा रहे हैं। इस मेले में औजार बेचने के लिए ग्राहकों का इंतजार नहीं करना पड़ता। ग्रामीण फसल काटने के लिए मेले से ही औजार खरीदते हैं।
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