श्रीनगर। आखिरकार केदारनाथ जलप्रलय के पांच साल बाद प्रदेश सरकार को औद्यानिक प्रशिक्षण एवं परीक्षण केंद्र की याद आ गई। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत की ओर से चाहरदीवारी निर्माण के लिए की गई घोषणा से अब यह पुराने स्वरूप में लौट पाएगा। मुख्यमंत्री की सहमति मिलने के बाद उद्यान विभाग की ओर से भेजे गए प्रस्ताव को मंजूरी मिल जाएगी, जिससे केंद्र को अतिक्रमण से बचाया जा सकेगा।
2 जून 1975 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा के हाथों श्रीनगर में अलकनंदा नदी किनारे घाटी फल शोध एवं प्रदर्शन केंद्र का उद्घाटन हुआ था। लगभग 4.6 हेक्टेअर में फैले केंद्र का मकसद शोध, पहाड़ में होने वाली सब्जियों एवं फलों की पौध तैयार करना, स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण और आय के साधन विकसित करना था। बाद में इसका नाम बदलकर औद्यानिक प्रशिक्षण एवं परीक्षण केंद्र कर दिया गया। इस केंद्र से उद्यान विभाग की ठीक-ठाक आय हो जाती थी, लेकिन 16/17 जून को आई बाढ़ ने इसकी पूरी तस्वीर बदलकर रख दी। अलकनंदा नदी के पानी के साथ आए मलबे ने केंद्र की छह फीट ऊंची सुरक्षा दीवार को तोड़ दिया था। बाढ़ के मलबे में आडू, बेल और करोंदे के पेड़ दब गए और आपदा से बचे पेड़-पौधे भी सुरक्षा के अभाव में नष्ट हो रहे हैं। नर्सरी अतिक्रमण की चपेट में है। पिछले पांच साल से उद्यान विभाग हर साल केंद्र की मरम्मत व सफाई के लिए प्रस्ताव भेजता आया है, लेकिन सरकारों ने इसे मंजूरी नहीं दी। बीते 23 नवंबर को श्रीनगर पहुंचे मुख्यमंत्री ने केंद्र की चाहरदीवारी निर्माण के लिए स्वीकृति देकर इसके पुराने दिन लौटाने की सौगात दी है।
केंद्र से मरम्मत के लिए तीन माह पूर्व शासन को 1 करोड़ 23 लाख का दोबारा इस्टीमेट भेजा गया है। इससे चाहरदीवारी के निर्माण के साथ ही अन्य सुधारीकरण कार्य होंगे। रतन सिंह चौधरी, उप निदेशक उद्यान विभाग