ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश। चिकित्सा क्षेत्र में लगातार अपग्रेड रहने की खास जरूरत है। जब तक एक स्टूडेंट पढ़ाई पूरी कर चिकित्सक बनता है तब एक जमाना बीत चुका होता है। असर यह होता है कि इलाज के मोर्चे पर हम कई साल पीछे की तकनीक ढो रहे होते हैं। ऐसे में किताबी पढ़ाई के अलावा लगातार नव तकनीक से जुड़े रहने की जरूरत है। एम्स में एनॉटमी विभाग इसका सर्वोत्तम उदाहरण है। दुनिया भर के संस्थानों को यहां के टीचिंग फॉरमेट से प्रेरणा लेने की जरूरत है। देश के अन्य मेडिकल कालेजों को भी मल्टीमीडिया, वर्चुअल डिसेक्शन व क्लीनिकल एनाटमी को प्राथमिकता के आधार पर विद्यार्थियों को पढ़ाना होगा। यह बात एम्स निदेशक प्रो. रविकांत ने नॉटकान-66 के वार्षिक अधिवेशन के समापन के दौरान कही।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान ऋषिकेश (एम्स) में एनाटॉमिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के तत्वावधान में आयोजित नॉटकान के 66वें वार्षिक अधिवेशन का बुधवार को समापन हो गया। अधिवेशन के अंतिम दिन 126 प्रतिभागियों ने विभिन्न विषयों पर अपने-अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इनमें हिस्ट्रोलाजी, क्रिमिनो हिस्ट्रो कैमिस्ट्री, एंब्रालाजी, जेनेटिक्स, साइटोलॉजी, मेडिकल एजूकेशन, इम्यूनोलॉजी, क्लीनिकल एनाटमी, क्लीनिकल रेडियोलॉजी आदि विषय शामिल रहे।
एम्स के एनाटॉमी विभागाध्यक्ष व आयोजन सचिव प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह ने अधिवेशन के आयोजन में सहयोग व मार्गदर्शन के लिए एम्स निदेशक प्रो. रविकांत, डीन डॉ. सुरेखा किशोर का आभार व्यक्त किया। अधिवेशन के समापन सत्र में एनाटॉमिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष डॉ. सुरजीत घटक, जनरल सेक्रेट्री डॉ. जीएस लोंगिया ने शिरकत की। इस मौके पर एम्स दिल्ली के प्रो. टीएस राय, रायपुर के प्रो. माणिक चटर्जी, हिमालयन इंस्टीट्यूट जौलीग्रांट के डॉ. एसएल जेठानी, दून मेडिकल कॉलेज के डॉ. महेंद्र पंत आदि ने अधिवेशन के सफल आयोजन की प्रशंसा की।
एनाटमिकल सोसाइटी के अध्यक्ष बने माणिक
नॉटकान-66 के समापन अवसर पर एनाटमिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया की बैठक आयोजित हुई। इसमें वर्ष 2019 की कार्यकारिणी की घोषणा हुई। इस दौरान प्रो. माणिक चटर्जी को अध्यक्ष और प्रो. एसएल जेठानी एनाटॉमिकल सोसाइटी के महासचिव चुने गए। वहीं एम्स ऋषिकेश के प्रो. ब्रिजेंद्र सिंह वर्ष 2020 में सोसाइटी के राष्ट्रीय अध्यक्ष होंगे।
चेहरा बता देता है पर्यावरणीय बदलाव की रफ्तार
पर्यावरण परिवर्तन का असर चेहरे पर भी पढ़ा जा सकता है। एक शोध से पता चला है कि मणिपुर के मैदानी इलाकों में रहने वाली पेलेमंगोलॉयड जाति के लोगों के चेहरे की आकृति में परिवर्तन आया है। सिक्किम मणिपाल इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल साइंस की पीएचडी धारक डा. बेदिता देवी ने बताया कि उन्होंने मणिपुर में 400 लोगों के चेहरे की बनावट पर चार सालों तक अध्ययन किया। अधिवेशन में उन्होंने पांच पैरामीटर्स तय किए और शोध का निचोड़ निकाला है। शोध में एंथ्रोप्रोमेटिक मेजरमेंट से चेहरों में होने वाले बदलाव को देखा गया। इस अध्ययन से पता चला कि इन लोगों के नाक की चौड़ाई बढ़ी है, जबकि नाक की लंबाई में कोई परिवर्तन नहीं आया है। वहीं चेहरे की लंबाई में वृद्धि पाई गई।
मां का कुपोषण बना सकता है बच्चे को दिव्यांग
अगर गर्भावस्था के दौरान महिला का खानपान सही तरीके से न हो, तो इससे कई गंभीर समस्या बच्चे मेें देखने को मिलती हैं। इतना ही नहीं बच्चा दिव्यांगता का भी शिकार हो सकता है। कस्तूरबा मेडिकल कॉलेज मैंगलोर (कर्नाटक) से एमबीबीएस प्रथम वर्ष के छात्र कौस्तुभ सिंह ने अपना शोध प्रस्तुत किया। शोध में सामने आया कि जब बच्चा अपनी मां के पेट होता है। उस समय उसका आकार मात्र 14 मिलीमीटर का होता है। उस वक्त गर्भवती मां का खानपान सही न होने के कारण बच्चे की धमनियों में भिन्नता आ जाती है। कौस्तुभ ने इसका दुष्प्रभाव बताते हुए कहा कि ऐसे मनुष्य में आंतों का पैर में उतर आने की संभावना ज्यादा होती है। इससे बच्चे दिव्यांग हो सकते हैं।