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पश्चाताप में ग्रामीणों ने किया गागली युद्ध

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ब्यूरो/अमर उजाला
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साहिया। उत्पाल्टा गांव से कुछ दूर युद्ध स्थल के रूप में सजा क्याणी डांडा स्थित घास का मैदान और ढोल दमाऊ की थाप पर गागली (अरबी के डंठल से) युद्ध करते लोग। शुक्रवार को दशहरा पर्व पर उत्पाल्टा और कुरोली गांव के लोगों ने सदियों पुरानी मान्यता का निर्वहन करते हुए इसी अंदाज में पाइंता पर्व मनाया।
लोगों के बीच करीब एक घंटे तक गागली युद्ध हुआ। इसके बाद दोनों गांव के लोगों ने एक-दूसरे को गले मिलकर पाइंता पर्व की बधाई दी। पंचायती आंगन में ढोल दमाऊ की थाप पर हारुल और तांदी नृत्य किया गया। इससे पूर्व सैकड़ों लोगों ने घास-फूंस से बनी दो सगी बहनों रानी और मुन्नी की प्रतिमाओं को कुएं में विसर्जित किया। सुबह थाती-माटी (गांव का मूल स्थान) और गांव के कुल देवता बत्तिसर देव की पूजा की गई। इसके बाद लोगों ने दोनों बहनों की मृत्यु के दोष से बचने के लिए पश्चाताप में क्याणी डांडा स्थित घास के मैदान में अरबी के डंठलों से गागली युद्ध किया। मालूम हो कि दशहरे के दिन जब पूरा देश रावण दहन कर अपने अंदर की बुराइयों को समाप्त करने का संकल्प लेता है, उसी दिन देहरादून जिले के जौनसार बावर क्षेत्र के उत्पाल्टा और कुरोली गांव में लोग आपस में गागली युद्ध करते हैं। इस युद्ध में किसी की भी हार या जीत नहीं होती।
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दोनों बहनों के जन्म नहीं लेने तक जारी रहेगा युद्ध
उत्पाल्टा के ग्राम प्रधान सतपाल राय ने बताया कि किवंदतियों के अनुसार करीब 400 साल पहले रानी और मुन्नी नाम की दो बहनें थी। दोनों एक साथ कुएं पर पानी भरने जाती थीं। एक दिन रानी की कुएं में गिरने से मौत हो गई। लोगों ने रानी की मौत के लिए मुन्नी को दोषी ठहराया। इससे खिन्न होकर मुन्नी ने भी कुएं में छलांग लगाकर जान दे दी। बहनों की मौत के श्राप से बचने के लिए लोग महासू देवता की शरण में गए। देवता ने श्राप से बचने के लिए दोनों बहनों की घास फूस की प्रतिमाओं को दशहरे के दिन कुएं में विसर्जित करने की बात कही। तब से उत्पाल्टा में पाइंता पर्व मनाने की परपंरा शुरू हो गई। लोग दशहरे के दिन पश्चाताप स्वरूप गागली युद्ध करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक गांव में दशहरे के दिन दो कन्याओं का जन्म नहीं होता, तब तक यह परंपरा जारी रहेगी ताकि, गांव को किसी अनहोनी से बचाया जा सके।
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