कर्णप्रयाग। वर्ष 2013 की आपदा में बहे पिंडर घाटी के पांच झूला पुल पांच साल बाद भी नहीं बन पाए हैं। यहां करीब 24 करोड़ की लागत से तीन पुलों के निर्माण की स्वीकृति मिल चुके हैं लेकिन निर्माण कार्य शुरू होने के दो साल बाद भी दो पुलों का काम पूरा नहीं हुआ है। हालांकि निर्माणदायी विभाग के अधिकारी दिसंबर तक दोनों पुलों का निर्माण पूरा करने की बात कह रहे हैं। अगर समय से पुल बन जाते तो लोगों को जान जोखिम में डालकर आवाजाही नहीं करनी पड़ती।
जून 2013 की बाढ़ में देवाल ब्लाक के बोरागाड़, हरमल, सुपलीगाड़, थराली के चेपड़ों, हरमनी और नारायणबगड़ का झूला पुल बह गया था। इस पर लोनिवि ने बोरागाड़, सुपलीगाड़, चेपड़ों और हरमनी में पहले ट्रालियां लगाईं। आए दिन ट्रालियां खराब होने से यहां लिंगड़ी, बोरागाड़, सेरा, विजयपुर, जौला, बुड़जौला सहित 20 से अधिक गांवों के ग्रामीण बोरागाड़, सुपलीगाड़ और चेपड़ों में लकड़ी की पुलिया बनाकर आवागमन करते हैं। यही नहीं 15 जुलाई की आपदा से कुलिंग और वाण के लोग भी लकड़ी की पुलिया के सहारे गदेरे पार कर रहे हैं। देवाल की प्रमुख उर्मिला बिष्ट का कहना है कि पुलों का निर्माण न होने से आए दिन हादसे हो रहे हैं। 16 जुलाई को रतगांव में पुल बनाते समय एक व्यक्ति बह गया, जबकि 15 अक्तूबर को बल्लियों के सहारे नदी पार करती भौरियाबगड़ गांव की भाभी और ननद नदी में बह गईं। यदि गांवों के आवागमन के लिए झूला पुलों का निर्माण समय पर हो जाता तो लोगों को अस्थायी पुलिया या बल्लियों के सहारे जान जोखिम में रखकर आवागमन नहीं करना पड़ता। दूसरी ओर विश्व बैंक डिवीजन गौचर के अधिशासी अभियंता आरके चौहान ने बताया कि सही जमीन नहीं मिलने और अन्य कारणों से पुलों के निर्माण में देरी हुई है। नारायणबगड़ का पुल बन गया है, जबकि चेपड़ों और बोरागाड़ का पुल दिसंबर तक तैयार हो जाएगा। हरमल और सुपलीगाड़ में झूला पुल निर्माण की स्वीकृति मिली है, जिसे वन अधिनियम की स्वीकृति मिलनी बाकी है।