ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी भले ही तीर्थनगरी ऋषिकेश खुद नहीं आ सके हों, मगर उनकी यादें इस शहर में त्रिवेणीघाट पर स्थापित गांधी स्तंभ के रूप में जीवित हैं। वर्ष 1929 से आज तक यह स्थल आंदोलनकारियों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं। आजादी के दौर में क्रांतिकारी इसी स्तंभ के नीचे बैठकर रामधुन गाकर स्वतंत्रता आंदोलन की अलख जगाते रहे।
गौरतलब है कि 1929 में जब बापू उत्तराखंड यात्रा के दौरान अल्मोड़ा में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े सेनानियों से मिलने पहुंचे थे। उसी वक्त उन्हें तीर्थनगरी से अल्मोड़ा पहुंचे क्रांतिकारियों ने उन्हें तीर्थनगरी ऋषिकेश आने का न्यौता दिया था। तब तीर्थनगरी के क्रांतिकारी उड़िया बाबा, जयप्रकाश शर्मा, ब्रह्मचारी हरिजीवन, स्वामी सदानंद, स्वामी अद्वैतानंद आदि उनसे मिले थे। हालांकि तब समयाभाव के कारण बापू ने तीर्थनगरी आने पर असमर्थता व्यक्त की थी।
तब क्रांतिकारी खाली हाथ नहीं लौटना चाहते थे, तो उन्होंने एक शिला पर बापू से हस्ताक्षर लिए और उसे लेकर वापस लौटे। जिसे उसी दौरान स्तंभ का निर्माण कराकर उसके शीर्ष पर स्थापित किया। महात्मा गांधी बापू की यादों से जुड़ा यह प्रतीक स्तंभ त्रिवेणीघाट के मुहाने पर आज भी क्रांतिकारियों को संघर्ष की प्रेरणा दे रहा है।
अन्ना आंदोलन में तीर्थ बना था स्तंभ
नगर पालिका के पूर्व सभासद विनय मनमीत ने गांधी स्तंभ से जुड़ी जानकारियों के साथ बताया कि वर्ष 2011 में अन्ना आंदोलन के दौर में यह स्तंभ क्रांतिकारियों के लिए तीर्थ बना गया था। इससे पूर्व यहां यदाकदा ही आंदोलनात्मक गतिविधियां दिखती थी। प्रतिवर्ष दो अक्तूबर को जरूर लोग गांधी स्तंभ पर स्वतंत्रता सेनानी श्रद्धासुमन अर्पित करने पहुंचते थे।