ब्यूरो/अमर उजाला, ऋषिकेश । एम्स ऋषिकेश के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की ओर से सुरक्षित ब्लड ट्रांसफ्यूजन विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया, जिसमें न्यूक्लिक एसिड एप्लीकेशन टेस्टिंग नेट टेस्ट के साथ होने वाले सभी रक्तदान को संभावित संक्रमण से मुक्त बताया गया है। विभाग की हेड डॉ. गीता नेगी ने बताया गया कि रक्तदान से किसी भी जरूरतमंद व्यक्ति की जान बचाई जा सकती है, मगर उसी जीवनदाता रक्त में ट्रांसफ्यूजन संक्रमण से होने से बीमारियों का खतरा भी छिपा होता है। बताया गया कि ऐसी बीमारियों का पता लगाने में कई बार तीन से आठ हफ्ते तक का समय लग जाता है।
उन्होंने बताया कि पारंपरिक एलिजा टेस्टिंग से दूषित रक्त से होने वाली एचआईवी के वायरस का पता लगाने में कम से कम 20 दिन का समय लगता है, जबकि हेपेटाइटिस- बी के लिए 53 दिन और हेपाटाइटिस- सी के लिए 58 दिन का समय लग सकता है। डॉ. गीता के मुताबिक अब रक्तदान से पहले रक्तदाता के रक्त में मौजूद उक्त संक्रमित वायरस का पता लगाने के लिए न्यूक्लिक एसिड एप्लीकेशन टेस्टिंग के जरिए एचआईवी के वायरस का पता महज पांच दिन में, हेपेटाइटिस- बी के वायरस की जानकारी में 24 दिन और हेपाटाइटिस- सी के वायरस का पता महज चार दिन में लगाया जा सकता है।
एम्स के जनसंपर्क अधिकारी हरीश थपलियाल ने बताया कि संस्थान के निदेशक प्रोफेसर डा. रवि कांत की ओर से इस दिशा में सराहनीय कदम उठाया गया है। बताया कि एम्स ऋषिकेश में इस तरह के संक्रमण की जांच के लिए नई मशीन स्थापित की गई है। इसी के साथ एम्स ऋषिकेश उत्तराखंड का पहला अस्पताल बन गया है, जहां पर इस तरह की अत्याधुनिक मशीन द्वारा रक्तदान के समय ही नेट टेस्ट के माध्यम से रक्तदाता के रक्त में मौजूद छोटे से छोटे वायरस का भी पता लगाया जा सकेगा। कार्यशाला में डीन प्रो. मनोज गुप्ता, कार्यशाला की आयोजक चेयरपर्सन डॉ. गीता नेगी, आयोजक सचिव डॉ. शीतल मल्होत्रा आदि मौजूद थे।