ब्यूरो/अमर उजाला,श्यामपुर/ऋषिकेश।
कहते हैं कि दिल में यदि कुछ कर गुजरने का जज्बा हो तो मंजिले खुद-ब-खुद आपकी तरफ चली आती है। कुछ ऐसा कर दिखाया है ऋषिकेश के आदर्श मैंदोला ने। तमाम परेशानियों के बावजूद आदर्श ने आईआईटी क्वालिफाई किया है। आर्थिक तौर पर कमजोर पृष्ठभूमि और कैरेटोकोनस नामक बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद आदर्श ने हिम्मत नहीं हारी और लगन व कड़ी मेहनत से सफलता अर्जित कर अपने नाम की सार्थकता को साबित करते हुए युवाओं के आदर्श बने। उनके दादा सुरेंद्र लाल मैंदोला पूर्व में आईडीपीएल के कर्मचारी रहे हैं, जबकि पिता विपिन मैंदोला आईडीपीएल परिसर में एक परचून की दुकान पर काम कर किसी तरह से घर परिवार की गुजर-बसर करते हैं।
मूलरूप से ग्राम कलिश, पौड़ी गढ़वाल निवासी आदर्श हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान कैरेटोकोनस नामक आंखों की बीमारी से ग्रस्त हो गए और उनको आंखों से दिखाई देना बंद हो गया। बकौल आदर्श वह क्लासरूम में ब्लैक बोर्ड तक नहीं देख पाता था। स्थानीय चिकित्सकों ने उनकी जांच के बाद दिल्ली एम्स में परीक्षण कराने का सुझाव दिया। गंभीर बीमारी से ग्रस्त होने के बावजूद आदर्श ने हाईस्कूल की परीक्षा में 10 सीजीपीए प्राप्त किए।
एक ओर आदर्श की दोनों आंखों के ऑपरेशन का सिलसिला शुरू हुआ और आंखों में रिंग डाली गई। तो दूसरी ओर जीवन के इस कष्टप्रद क्षणों में उसने 12वीं की परीक्षा देने के साथ ही आईआईटी की तैयारी भी शुरू कर दी। कमजोर आर्थिकी व बीमारी आदर्श के संकल्प के आगे कहीं आड़े नहीं आई और उसने बिना कोचिंग के घर पर ही तैयारी कर आईआईटी मेंस में पहली बार में ही सफल अर्जित कर ली। अब वह आईआईटी एडवांस की तैयारी में जुटे हैं।
आदर्श का कहना है कि उसकी कंप्यूटर प्रोग्रामिंग में गहरी रुचि है। आदर्श किसी अच्छे कॉलेज से बीटेक करना चाहता है, लिहाजा वह आईआईटी एडवांस की तैयारी में जुटा है। आदर्श बताते हैं कि उनके पिता भी डिप्लोमा मेकेनिकल इंजीनियर रह चुके हैं, मगर उन्हें पारिवारिक कारणों से नौकरी छोड़नी पड़ी थी। वह अपनी इस सफलता का श्रेय शिक्षकों, माता-पिता, दादा- दादी व मित्रों को देते हैं। आदर्श के दादा सुरेंद्र लाल मैंदोला और दादी सुशीला देवी अपने पोते की इस सफलता पर खुश हैं।