ब्यूरो/अमर उजाला,ऋषिकेश।
जीवन में बेजुबान एवं निरीह पशु-पशियों की सेवा सबसे बड़ा धर्म का काम है। ऐसे ही धर्म के काम में जुटी हुई हैं, मुनिकीरेती की शीशमझाड़ी निवासी रीना चौधरी। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि बहुत बेहतर नहीं है, बावजूद इसके वह फिर भी कई वर्षों से विकलांग गायों की निस्वार्थ सेवा में समर्पणभाव से जुटी हैं। पैरों से लाचार गोवंश की सेवा के प्रति उनके जज्बे का अंदाजा इसी बात से लगता है कि उनका भवन कुल तीन कमरों का है, जिसमें से दो कमरों में उनकी पूरा परिवार रहता है, जबकि एक कमरे में वह विकलांग गोवंश की सेवा करती हैं। इस कमरे में उनकी तीन विकलांग गायें और दो बछड़े रहते हैं।
इनमें से दो के पैर कटे हैं, जबकि एक का कूल्हा उतर गया है। उन्होंने बताया कि वह बीते छह, सात वर्षों से विकलांग गायों की सेवा करती हैं। उन्हें जहां भी ऐसी गायें नजर आती हैं, उन्हें अपने आशियाने में लाकर उनकी सेवा में जुट जाती हैं। वह गोवंश के लिए चारा, पानी आदि प्रबंध तो करती ही हैं, उनके बीमार पड़ने पर संपूर्ण उपचार का खर्च भी निजी तौर पर उठाती हैं। इस कार्य के लिए वह किसी से कोई मदद भी नहीं लेती हैं। इनके अलावा उनके पास 10 निराश्रित कुत्ते भी हैं, जिनके भोजन का प्रबंधन भी रीना ही करती हैं। इनमें से कुछ उनके पास रहते हैं जबकि कुछ आसपास खुले आसमान के नीचे सोते हैं।
हरियाणा मूल की रीना चौधरी ने बताया कि इससे पूर्व उनकी ऋषिकेश यात्रा बस अड्डे पर गोशाला थी, जिसमें वह काफी संख्या में विकलांग गायों की सेवा करती थीं। वहां से गोशाला हटने के बाद वह अपने घर पर ही गो सेवा करती हैं। बकौल रीना उन्हें अपने पति राजेश चौधरी से गोसेवा की प्रेरणा मिली। रीना स्वयं कुछ समय से थायराइड की बीमारी से ग्रस्त हैं, मगर इसके बावजूद गोवंश की सेवा के प्रति उनका जज्बा जरा भी कम नहीं हुआ है।
इंसेट
गोवंश सेवा पर प्रतिमाह 15 हजार खर्च
रीना ने बताया कि उनकी गोवंश की सेवा का मासिक खर्च करीब 15 हजार रुपये हैं, जिसमें भूसा, चारा, पानी का प्रबंध तो है ही, इसके अलावा वह सुबह-शाम उन्हें मौसमी फल भी खिलाती हैं।
बाजार से खरीदती हैं घर के लिए दूध
रीना ने बताया कि वह दुधारू गायों की बजाए गोवंश की सेवा करती हैं। जबकि वह अपने घर के इस्तेमाल के लिए दूध बाजार से खरीदकर लाती हैं। वह अपने जिस कमरे में गोवंश की सेवा करती हैं, उसका दरवाजा ढालवाला ड्रेन के ऊपर बनी सड़क पर खुलता है। जिसमें वह छोटी मोटी दुकान खोलकर अपनी आय के स्रोत बढ़ा सकती थीं, मगर गोवंश की सेवा के संकल्प के आगे उन्होंने किसी तरह के मुनाफे की सोच को तवज्जो नहीं दी।