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अब पतंजलि का नाम ही हो जाएगा पेटेंट का प्रमाण

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हरिद्वार। आने वाले कुछ ही समय में वस्तुओं पर लगा पतंजलि का लेबल पेटेंट मान लिया जाएगा। कई देशों से पतंजलि में चले आयुर्वेदिक अनुसंधान कार्यों को मान्यता मिल गई है। यहां तक कि भारत सरकार का आयुष मंत्रालय भी यहां चल रहे आयुर्वेदिक निष्कर्षों को प्रमाण मानने लगा है। अत्याधुनिक प्रयोगशाला में करीब 250 देशी-विदेशी वैज्ञानिक अनेक प्रकार के अनुसंधान कार्यों में जुटे हैं।
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स्वामी रामदेव की पतंजलि योगपीठ का आयुर्वेदिक अनुसंधान केंद्र देश का ऐसा एकमात्र केंद्र बन गया है जो भारत सरकार के बाद सबसे बड़ा काम कर रहा है। विदेशों में आयुर्वेद के प्रचार ने हाल ही में जोर प्रकड़ा है, उसके मूल में पतंजलि का अनुसंधान केंद्र प्रमुख है। इस अनुसंधान केंद्र में विश्व के वे सभी उपकरण हैं, जिन्हें अनुसंधान कार्यों में श्रेष्ठतम माना जाता है। करीब 40 विदेशी वैज्ञानिकों के साथ इस कार्य में 200 भारतीय वैज्ञानिक आयुर्वेद के गहन प्रयोगों में जुटे हैं। अब तक दुनिया में एलोपैथिक क्षेत्र में ही अनुसंधान चलते थे। पतंजलि के बाद अब देश में कईं जगह अनुसंधान केंद्र खुलने लगे है। पतंजलि द्वारा जिन औषधियों और जुड़ी बूटियों पर शोध के बाद अंतिम निष्कर्ष निकाले गए हैं, उन्हें अब सारी दुनिया में ही मान्यता मिल गई हैं। योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि अब तक विदेशी मानक संस्थान ही अंतिम निष्कर्ष निकाल रहे थे। यही वजह थी कि नीम और हल्दी तक के क्षेत्र में अमेरिका में पेटेंट ले लिए गए थे। अब पतंजलि के अनुसंधानों ने सिद्ध कर दिया है कि यह सब बहुत पहले भारत में हो चुका है। पतंजलि अनुसंधान केंद्र के निष्कर्ष देशी-विदेशी विज्ञान जनरलों में प्रकाशित होने के बाद अब पतंजलि के निष्कर्ष को ही पेटेंट की मान्यता मिलती जा रही है।
आचार्य बालकृष्ण ने बताया कि स्वामी रामदेव वर्षों पहले से भारतीय सिद्धांतों को प्रमाणिक रूप से विश्व के शीर्ष पर पहुंचाने के लिए जुटे हुए हैं। अनुसंधान केंद्र बनने के बाद अब हमारे और आयुर्वेद के क्षेत्र में पुराने जमाने से चले आ रहे प्रयोगों को विश्व स्तरीय प्रमाण माना गया है। चूंकि पतंजलि के निष्कर्षों को कहीं से भी चुनौती नहीं मिली, अत: हमारे निष्कर्ष पेटेंट का काम करेंगे। आचार्य ने बताया कि स्वदेशी जागरण का जो अभियान बाबा रामदेव ने शुरू किया था, वह बहुत अगले मुकाम तक पहुंच चुका है। जब से संयुक्त राष्ट्र संघ से योग और प्रणायाम के कार्यों को विश्व व्यापी दर्जा दिया है, तब से आयुुुर्वेद का भी स्वर्णिम युग प्रारंभ हो चुुका है।
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