ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के नए सत्र से 15 जनवरी 2009 के बाद बढ़ी सीटें और कोर्स बंद करने के फैसले पर सवाल उठने लगे हैं। एक ओर छात्रों ने इसका विरोध किया है तो दूसरी ओर कॉलेजों की एसोसिएशन ऑफ सेल्फ फाइनेंस इंस्टीट्यूट ने भी विवि प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। एसोसिएशन का कहना है कि जब ऐसा कोई प्रावधान ही नहीं था तो कॉलेजों में किस आधार पर नए कोर्स और नई सीटें दी गईं? नौ साल में जितने कोर्स या सीटें दी र्गइं, उसका दोषी कौन है? जबकि गढ़वाल विश्वविद्यालय इस कोर्सेज से करोड़ों रुपये की रकम एफडी के रूप में जमा कर चुका है।
गढ़वाल विवि ने हाल ही में एमएचआरडी का हवाला देते हुए एक आदेश जारी किया है, जिसके तहत सत्र 2018-19 से किसी भी निजी, सरकारी या अशासकीय कॉलेज में 15 जनवरी 2009 (विवि के केंद्रीय विवि बनने की तिथि) के बाद जितने भी कोर्स या सीटें बढ़ाई गई हैं, वह बंद किए जा रहे हैं। इस फैसले से इन कॉलेजों में हजारों सीटें नए सत्र से खत्म हो जाएंगी और दाखिला संकट पैदा हो सकता है। छात्र और कॉलेज इस फैसले के विरोध में उतर आए हैं। एसोसिएशन ऑफ सेल्फ फाइनेंस इंस्टीट्यूट के अध्यक्ष सुनील अग्रवाल का कहना है कि कॉलेजों ने खुद सीटें या कोर्स नहीं लिए हैं। विवि ने पत्र भेजा था कि जिस कॉलेज को सीटें या कोर्स चाहिए, वे आवेदन कर सकते हैं। तभी कॉलेजों ने आवेदन किए।
इसके बाद विवि स्तर से गठित समिति ने कॉलेजों की जांच की। इसी के आधार पर ही मान्यता दी गई है। सुनील अग्रवाल ने सवाल उठाया है कि अगर सीट बढ़ोतरी या नया कोर्स देने का प्रावधान नहीं था तो इतनी मोटी एफडी की फीस लेकर कोर्स देने के पीछे किसकी गलती है? उन्होंने कहा कि यह सीधे-सीधे कॉलेजों की ग्रोथ खत्म करने के साथ ही प्रदेश के होनहारों के भविष्य के साथ भी धोखा है। वहीं, मामले में पहले ही कुलसचिव डॉ.एके झा कह चुके हैं कि नौ साल में जितनी भी सीट या कोर्स बढ़ोतरी की गई है वह अवैध थी। इसके लिए उस वक्त कुलपति रहे लोग जिम्मेदार हैं।