श्रीनगर। पहाड़ की भौगालिक परिस्थिति के अनुसार बुनियादी ढांचे के विकास के लिए तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान के लिए एनआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) उत्तराखंड में तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार बृहस्पतिवार को शुरू हुआ। इस मौके पर विषय विशेषों ने अपने अनुभव साझा करते हुए भूकंपरोधी और पहाड़ की प्रकृति के अनुसार सतत विकास की जरूरत बताई।
एनआईटी के सिविल इंजीनियरिंग विभाग की पहल पर शुरू हुए सम्मेलन का उद्घाटन आईआईटी रुड़की के प्रो. मनीष श्रीखंडे, सीबीआरआई रुड़की के वैज्ञानिक डॉ. अजय चौरसिया, आईआईटी कानपुर के सहायक प्रो. एस के मिश्रा, एनआईटी उत्तराखंड के कुलसचिव कर्नल सुखपाल सिंह, सिविल इंजीनियरिंग विभागाध्यक्ष डॉ. आदित्य कुमार अनुपम और सचिव सीआईएसएचआर डॉ. क्रांति जैन ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्ज्वलित कर किया।
कुलसचिव सुखपाल ने निदेशक प्रो. एसएल सोनी की ओर से ‘गढ़वाल का इतिहास’ पुस्तक अतिथियों को भेंट की। इसके बाद कार्यक्रम संयोजक आदित्य कुमार अनुपम ने कहा कि पहली बार राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। इस सम्मलेन के नतीजे मील का पत्थर साबित होंगे।
प्रो. मनीष श्रीखंडे ने पहाड़ी क्षेत्र में निर्माण की कठिनाइयों के बारे में बताया। उन्होंने बताया कि नींव में डंपर्स (शॉक ऑब्जबर्स) से भूकंपरोधी भवनों का निर्माण होना चाहिए। जब भूकंप आएगा तो शॉक आब्जबर्स झटकों को सह लेंगे और भवन सुरक्षित रहेंगे।
डॉ. अजय चौरसिया ने सभी के लिए आवास योजना की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि पूर्व से चली आ रही निर्माण तकनीकियों की वजह से निर्माण कार्य बहुत धीमे होते हैं। उन्होंने ऐसी तकनीकियों के बारे में बताया, जिनमें बेहतर गुणवत्ता के साथ कम समय में भवन बनाए जा सकते हैं।
एसके मिश्रा ने बताया कि भवनों के जोड़ों पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए। जोड़ टूटने से ही ढांचा गिरता है। उन्होंने कंपन तकनीकी पर आधारित ढांचा विकास के बारे में बताया।