श्रीनगर। केंद्रीय गढ़वाल विवि के मनोविज्ञान विभाग में नशा उन्मूलन (डी-एडिक्शन) प्रति जागरूकता बढ़ाने के मकसद से कार्यशाला का आयोजन किया गया।
कार्यशाला के मुख्य वक्ता एम्स ऋषिकेश के मनोचिकित्सा विभाग के सहायक प्रोफेसर विक्रम सिंह रावत ने उत्तराखंड में नशे के रूप में प्रयोग हो रहे पदार्थों और औषधियों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने नशीले पदार्थों के सेवन से बचाव के तरीकों पर जोर डालते हुए रोकथाम को सबसे उपयुक्त उपचार बताया। े कहा कि हमारे दिमाग में एक केंद्र होता है जो मादक पदार्थों कोकीन, हेरोइन, तंबाकू व भांग (चरस, गांजा) के सेवन से सक्रिय हो जाता है और व्यक्ति आसानी से नशे की लत का शिकार हो जाता है।
एनआईटी उत्तराखंड के काउंसलर डा. राजेश भट्ट ने नशे से संबंधित मनोवैज्ञानिक तथ्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि नशे की लत चाहे वो धूम्रपान, मदिरापान हो या भांग का नशा हो, कई बार इसका आदी होने के बावजूद व्यक्ति यह मानने से इनकार कर देता है कि वह व्यसनी है। उसे यह लगने लगता है कि वह जब चाहे मादक पदार्थों का सेवन छोड़ सकता है। लेकिन वास्तव में वह कभी भी नशे से खुद को मुक्त नहीं कर पाता है।
विवि के मनोविज्ञान विभाग की एचओडी प्रो. मंजू पांडेय ने नशे के आदी हो चुके व्यक्तियों के पुनर्वास पर बल देते हुए कहा कि ऐसे लोगों की काउंसिलिंग की जानी चाहिए। कार्यशाला में डीएसडब्लू प्रो. जेपी पचौरी, प्रो. किरण डंगवाल, प्रो. सुरेखा डंगवाल, प्रो. मोनिका गुप्ता, डा. गीता खंडूड़ी, डा. भारती राणा व डा. उमा बहुगुणा आदि मौजूद थे।