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शिव महापुराण में तीन कर्मों का वर्णन

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
कथा व्यास रामजी पांडेय पौराणिक ने कहा कि महापुराण में तीन प्रकार के कर्मों का वर्णन किया गया है। संचित, प्रारब्ध और क्रियामान तीन प्रकार के कर्म हैं। प्रारब्ध और पुरुषार्थ साथ-साथ चलते हैं।
बिल्वकेश्वर महादेव के प्रागंण में शिव महापुरण की कथा सुनाते हुए पौराणिक ने कहा कि पहले प्रारब्ध बनता है और बाद में शरीर। शरीर बनते समय मृत्यु का समय भी निर्धारित हो जाता है। पुरुषार्थ के दम पर मनुष्य शक्ति अर्जित करता है, किंतु प्रारब्ध को टाल नहीं सकता। भगवान शिव ने इस देह को विषपान कर विष युक्त बनाया और गले में विष वाले सर्प भी लपेट लिए। यह इस बात का प्रतीक है कि जिस शरीर को सुंदर और बलवान माना जाता है, उसके साथ-साथ सर्प रूपी मृत्यु भी लिपटी हुई है। जहां आयु की घड़ियां समाप्त होती हैं, वहीं शरीर की मृत्यु हो जाती है। यह आत्मा कभी नहीं मरती। वह तो अनश्वर है। शिव श्यामल स्वरूप के है और अपने शरीर पर भस्म पोतकर रखते हैं। शिव का यह रूप देखकर पार्वती की माता मैना कष्टमय हो जाती हैं। नारद के बहुत समझाने के बावजूद वे पुत्री का विवाह शिव से नहीं करना चाहती। पार्वती की जिद के आगे मैना की एक नहीं चलती।
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कथा व्यास ने कहा कि वास्वत में पार्वती तो दुर्गा हैं, आदि शक्ति हैं। जैसे जल और तरंग एक हैं, वैसे ही शिव और पार्वती भी एक रूप हैं। वे तो पहले ही शिव में लीन हो चुकी हैं। अब विवाह की लीला विश्व रंगमंच के लिए की जा रही है। कल्याण की भावना से प्रारब्ध और पुरुषार्थ साथ-साथ चलते हैं।
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