अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी हंसदेवाचार्य ने कहा कि इस संसार और ब्रह्म को ज्ञान के बल पर समझा जा सकता है। तप ऐसा माध्यम है जिससे आत्म चिंतन के परमाणु सर्वत्र बिखर जाते हैं। महापुरुषों के तप से संसार को तेज मिलता है और ज्ञान व्यक्ति के मुख मंडल को ऊर्जा प्रदान करता है।
महान संत टाटवाले बाब के स्मृति समारोह के अंतिम दिन जगद्गुरु ने कहा कि संतों का सानिध्य चिंताओं का विनाश करता है। टाट वाले बाबा उस कोटि के संत थे कि उनके तट पर आते ही आज भी नव चेतना जागृति हो जाती है। परमात्मा के चिंतन में जुटे संत ज्ञान की साधना करते हैं, और अपने तपोबल का प्रभाव समाज को दे जाते हैं। यह जगत मिथ्या है और ब्रह्म ही सत्य है। यह ज्ञान विरक्त संतों के माध्यम से संसार तक पहुंचा है। उन्होंने कहा कि गंगा मैया तो पूरे भारत में बहती है। किंतु महापुरुषों के स्मृति स्थलों पर विशेष शांति प्राप्त होती है। जिन स्थानों पर महापुरुषों की समाधियां हैं, वे स्थल ज्ञान का प्रकाश उत्पन्न करते हैं। महामंडलेश्वर हरि चेतनानंद ने कहा कि प्रत्येक शताब्दी में युगदृष्टा संतों में प्रकाश फैलाया है। जिस स्थनों पर उनके उत्साव चलते हैं, वहां कभी कोई कमी नहीं आती। महामंडलेश्वर स्वामी श्यामसुंदरदास शास्त्री ने कहा कि इस स्थल 28 वर्षों से बीतराग संत टाटवाले बाबा को उत्सव होता है। प्रत्येक वर्श उनकी आभा और निखरी हुई नजर आती है। महापुरुष मरकर भी न केवल विचारों के रूप में अपितु समाधि के रूप में भी हमारे साथ चलते हैं।
शिव कथा व्यास पौराणिक रामजी पांडेय ने कहा कि जो व्यक्ति गुरुओं के सम्मुख नतमस्तक हो जाता है, उसका अहंकार स्वत: मिट जाता है। हमारे धर्मशास्त्रों मे समर्पण का भारी महत्व बताया गया है। गंगा के तट पर आने से सभी प्रकार की चिंता मिट जाती है। ऐसे पुण्य स्थल पर टाटवाले बाबा जैसे संतों का चिंतन किया जाए तो उनके समाधि स्थल से निकला प्रकाश मानव मात्र का कल्याण करता है। इस अवसर पर आचार्य रविदेव, स्वामी प्रकाश मुनि, स्वामी सुतीक्ष्ण मुनि, महंत दिव्वेश दास, डॉ. हरिहरानंद, स्वामी केशवानंद, स्वामी हरिबोल, स्वामी जमनादास, महंत ज्ञानानंद, महंत रविन्द्रानंद, महंत प्रेमदास आदि ने भी विचार रहे। भव्य संकीर्तन के साथ प्रधानाचार्य पदम प्रकाश द्विवेदी ने बाबा की समाधि पर माल्यार्पण की परंपरा संपन्न कराई।