श्रीनगर। राज्य निर्माण के लिए प्राणों की आहुति देने वाले यशोधर बेंजवाल और राजेश रावत को शासन-प्रशासन ने भुला दिया है। सरकारी घोषणा के बावजूद दोनों आंदोलनकारियों की याद में आज तक कोई स्मारक नहीं बन पाया।
राज्य निर्माण आंदोलन के दौरान 10 नवंबर 1995 को श्रीयंत्र टापू कांड (श्रीनगर) में राजेश रावत और यशोधर बेंजवाल शहीद हो गए थे। शहीद यशोधर बेंजवाल का जन्म रुद्रप्रयाग जिले के बेंजी गांव में 22 जून 1958 को धूमा देवी और मित्रानंद बेंजवाल के घर हुआ था। सामान्य कृषक परिवार से ताल्लुक रखने वाले यशोधर ने कठिनाइयों के बावजूद कभी हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने चोपता में स्वतंत्र व्यवसाय के बाद श्रीकोट गंगानाली में मेडिकल स्टोर खोला। अगस्त 1994 में पृथक राज्य गठन की लहर से वे खुद को बचा न सके और राज्य निर्माण आंदोलन में कूद गए। उन्होंने 2 अक्तूबर 1994 को दिल्ली में आत्मदाह का निर्णय लिया, लेकिन पुलिस को इसकी भनक लग गई और उन्हें हिरासत में लेकर तिहाड़ जेल भेज दिया गया। इसके बाद भी उनके अंदर की ज्वाला शांत नहीं हुई और जेल से रिहा होने के बाद यशोधर फिर से आंदोलन में सक्रिय हो गए। 10 नवंबर 1995 को श्रीनगर में श्रीयंत्र टापू में चले आंदोलन के दौरान यशोधर और राजेश रावत पुलिस बर्बरता का शिकार हो गए। कुछ दिन बाद अलकनंदा नदी में दोनों आंदोलनकारियों के शव मिले थे।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद राज्य की पहली निर्वाचित सरकार ने श्रीयंत्र टापू कांड के शहीदों की याद में स्मारक बनाने की बात कही थी। यह घोषणा आज भी फाइलों में कैद है। राज्य तो बन गया, लेकिन शहीदों के सपने पूरे नहीं हो पाए। पहाड़ के विकास के लिए पहाड़ी राज्य मांगा गया था, लेकिन विकास हुआ तो मैदान का।
-अनिल स्वामी, राज्य निर्माण आंदोलनकारी
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श्रीयंत्र टापू कांड को 22 साल बीत गए, लेकिन इसके दोषियों को आज तक सजा नहीं मिली।
-दीपक बेंजवाल, सचिव उत्तराखंड शहीद यशोधर बेंजवाल स्मृति संस्था अगस्त्यमुनि