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बीचकैंपों से पटने लगे हरित पट्टी के बंजर खेत

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फोटो फाइल नेम-
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बीच कैंपों में बदले किसानों के लहलहाते खेत
-- आपदा के तीन साल बाद भी क्षतिग्रस्त नहरें और गूलें न बनने से किसानों ने किराए पर दी भूमि

हेमवती नंदन भट्ट
ऋषिकेश। वर्ष 2014 में यमकेश्वर में आई आपदा के बाद से क्षेत्र के तराई वाले इलाकों की हरियाली लुप्त हो गई है। इसकी वजह आपदा में हेंवल घाटी के किनारे बसे गांवों में क्षतिग्रस्त हुई सिंचाई नहरों व गूलों की पुनर्निर्माण नहीं होना रहा। जिसके कारण आर्थिक संकट से जूझते इन गांवों के काश्तकारों ने गुजर बसर के लिए अपनी बंजर भूमि को राफ्टिंग कंपनियों के संचालकों को बीच कैंप संचालन के लिए किराए पर दे दिए हैं। आपदा वर्ष से पहले तक हरियाली से लहलहाते हेंवल घाटी के गांवों के खेतों में अब बीच कैंप संचालित होने लगे हैं।
अगस्त 2014 में पौड़ी जिले के यमकेश्वर ब्लॉक में आई आपदा से जन धन हानि तो हुई ही, इससे हेंवल घाटी में आई भीषण बाढ़ तराई वाले इलाकों में काश्तकारों की कृषि भूमि भी बहा ले गई। बाढ़ से हेंवल घाटी के खेतों में सिंचाई के लिए बनी नहरों, गूलों के क्षतिग्रस्त होने से बीते तीन साल से लोगों के खेत बंजर पड़े हैं। यह स्थिति तब है कि जबकि सरकार ने आपदा के एक महीने के भीतर ही लघु सिंचाई महकमे से क्षतिग्रस्त गूलों की मरम्मत के लिए प्रस्ताव मांग लिए थे, लेकिन तीन साल बाद भी इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिल पाई है।
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ऐसे में स्थानीय काश्तकार, ग्रामीणों के समक्ष पारिवारिक गुजर बसर का संकट आ खड़ा हो गया था। ऐसे में लोगों ने अपने बंजर पड़े खेतों को राफ्टिंग कंपनियों के संचालकों को बीच कैंपों के संचालन के लिए किराए पर देना शुरू कर दिया है। सामाजिक कार्यकर्ता सत्यपाल सिंह राणा ने बताया कि हेंवल घाटी के दोनों ओर बसे कई गांवों के लोग अपने खेतों को कैंप संचालकों को रेंट पर दे चुके हैं।
इंसेट
हेंवल घाटी के फूलचट्टी गांव निवासी कास्तकार खुशहाल सिंह नेगी, श्याम सिंह नेगी, रत्तापानी के सत्यपाल सिंह राणा, बचन सिंह राणा, उदय सिंह राणा, जयपाल सिंह नेगी, घट्टगाड़ निवासी सुखवीर सिंह नेगी, नरेंद्र सिंह राणा, गबर सिंह राणा आदि का कहना है कि सिंचाई नहरें नहीं बनने से उनकी खेतीबाड़ी चौपट हो गई थी, जिससे उनके समक्ष परिवार की गुजर बसर की दिक्कतें आने लगी थी। ऐसे में उन्हें आजीविका चलाने के लिए बंजर पड़े खेतों को मजबूरी में बीच कैंप संचालन के लिए किराए पर देना पड़ा।
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सिंचित भूमि दरकिनार, असिंचित के लिए बना दी नहरें
लघु सिंचाई महकमे की कार्यप्रणाली भी यहां पर अजब रही। विभाग आपदा के तीन साल बाद भी क्षेत्र के किसी भी गांव में सिंचित भूमि की नहरों की मरम्मत नहीं करा पाया है। जबकि क्षेत्र के रत्तापानी गांव में कुछ एक स्थानों असिंचित भूमि पर नहरों की मरम्मत करा दी गई, जबकि यह नहरें बरसाती गदेरों से जुड़ी हैं। इनमें वर्षाकाल समाप्त होने पर पानी नहीं रहता ।
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