रतनमणी डोभाल
हरिद्वार।
करोड़ों की लागत वाली केंद्र पोषित बाढ़ सुरक्षा योजना में उत्तराखंड सिंचाई विभाग के अफसरों ने गोलमाल किया है। अफसरों ने अधिग्रहीत भूमि के एवज में मुआवजा तथा फसल प्रतिकर के भुगतान की जांच कराई तो सामने आया कि जिस जमीन को अधिग्रहीत कर उसकी रजिस्ट्रियां ंकराई गई उनका दाखिल खारिज नहीं कराया गया और जिन किसानों को मुआवजा नहीं दिया गया उनकी जमीन अधिग्रहीत कर ली गई। ऐसे में किसान मुआवजे के लिए चक्कर काटते फिर रहे हैं। इस जांच रिपोर्ट को भी अफसर दबा कर बैठे हैं।
सिंचाई खंड हरिद्वार ने वर्ष 2015-16 में गंगा नदी के कटाव से गांवों और उपजाऊ जमीन की सुरक्षा के लिए बाढ़ सुरक्षा योजना में तटबंध निर्माण के लिए सात गांवों के 195 काश्तकारों की भूमि अधिग्रहीत की थी। अधिग्रहीत भूमि का मुआवजा नहीं मिलने तथा कम-ज्यादा मुआवजा देने कालेकर सिंचाई खंड हरिद्वार से लेकर मुख्यालय स्तर तक शिकायतों का अंबार लग गया था। इस पर शासन ने अधिशासी अभियंता डीएस कछवाहा का तबादला कर उनके स्थान पर कोटद्वार से कमल सिंह को हरिद्वार भेजा था। उनके सामने जब मुआवजा वितरण में शिकायतें आई तो उन्होंने परीक्षण के तौर पर ग्राम रघुनाथपुर उर्फ बालावाली के काश्तकारों की अधिग्रहीत भूमि और फसल के मुआवजे की जांच के लिए आठ नवंबर 2016 को उप राजस्व अधिकारी एनएस कुंडरा की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय जांच समिति गठित की। समिति ने जांच रिपोर्ट अधिशासी अभियंता को दी। समिति ने एक ही गांव की जांच में लाखों रुपये की गड़बड़ियां पाई।
समिति ने खुलासा किया कि अस्थायी एडवांस मुआवजा देने के नाम पर सहायक अभियंता ने बाउचर अपने नाम बनवाए और स्वयं ही उन्हें पारित कराए। जबकि ये बाउचर किसी वरिष्ठ अधिकारी से पारित कराने थे। समिति ने यह भी पाया कि बालावाली से खानपुर तटबंध निर्माण के लिए काश्तकारों की निजी भूमि के भू-प्रतिकर एक करोड़ 26 लाख 58 हजार 560 रुपये का मुआवजा देना तैयार किया गया। मुआवजे का भुगतान बैंक ड्राफ्ट से किया गया है, परंतु वर्तमान समय तक 86 बैंक ड्राफ्टों के विरुद्ध मात्र 68 व्यक्तियों की ही रजिस्ट्रियां हुई हैं। जबकि भुगतान प्राप्त कर चुके 18 काश्तकारों की जमीन की रजिस्ट्रियां नहीं की गई हैं। ऐसे में पैसा भी चला गया और जमीन भी उन्हीं के पास है। जो रजिस्ट्रियां की गईं हैं,उनके सापेक्ष बैंक से ऋण अदायगी की एनओसी भी नहीं ली गई हैं। ऐसे में उनका दाखिल खारिज नहीं हुआ है। इन रजिस्ट्रियों को कराने के लिए बिना शासन की अनुमति के प्राइवेट वकील किया गया और रजिस्ट्रियां करने से पहले ही मार्च 2016 में 3 लाख 8 हजार रुपये का अग्रिम भुगतान किया गया। जबकि ऐसे मामलों में प्राइवेट वकील करने के लिए शासन से अनुमति लेना जरूरी होता है। समिति ने ऐसे ही कई और खुलासे भी किए हैं।
प्राप्ति रसीदों में किसानों के नाम भी नहीं
फसल प्रतिकर (मुआवजा) के संबंध में समिति ने नोट किया कि ईई की ओर से अपने कार्यालय ज्ञाप के साथ जो सूची संलग्न है उसमें फसल प्रतिकर की धनराशि 6 लाख 26 हजार 915 रुपये है, परंतु एई के नाम भुगतान के लिए अस्थायी अग्रिम भुगतान कर दिया गया। वह राशि 5 लाख 32 हजार 892 रुपये है। सहायक अभियंता ने बिना अनुमति के बाउचर अपने नाम बनाए। बाउचर 500 रुपये से अधिक के हैं और उन पर ईई के प्रतिहस्ताक्षर भी नहीं हैं जबकि पांच सौ रुपये से ज्यादा के बाउचर पर वरिष्ठ अधिकारी के हस्ताक्षर होने जरूरी हैं। हैंड रसीद के साथ जो प्राप्ति रसीद है उसमें काश्तकारों के नाम ही नहीं हैं। यह राशि कितनी फसल की किस दर से आई इसका भी पता नहीं चला तथा कुछ काश्तकारों के अंगूठे प्रमाणित भी नहीं हैं। हैंड रसीदों में भुगतान की तिथि भी नहीं जिससे यह पता नहीं चलता है कि भुगतान किसको किया गया।
प्रतिकर सूची में नाम भी सही नहीं
समिति ने पाया कि फसल प्रतिकर की सूची के क्रमांक 3 पर रामकुमार का नाम अंकित है जबकि भुगतान के क्रमांक 3 पर रामकुंवर का बाउचर लगा है। क्रमांक 9 पर राजेंद्र कुमार पुत्र घसीटा का नाम है, जबकि भुगतान के बाउचर पर राजेंद्र पुत्र रामकला अंकित हैं। हैंड रसीदों पर हेड ऑफ एकाउंट भी नहीं डाला गया है। एक बाउचर पर 1783 रुपये का बनाया गया, परंतु उस पर किसके हस्ताक्षर नहीं हैं।
वर्जन
डिवीजन स्तर पर पूरे मामले की जांच के आदेश दिए गए हैं। अभी रिपोर्ट प्राप्त नहीं हुई है। रिपोर्ट मिलते ही उसे दिखवाया जाएगा। इतने गंभीर प्रकरण की जांच की प्रति इतनी सुस्त क्यों हैं। रिपोर्ट आने के बाद कार्रवाई की जाएगी। -दिनेश चंद्रा, मुुख्य अभियंता