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श्राद्घों में तिथियों के साथ पंच गली का भी विधान

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अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
मातृनवमी के दिन हजारों श्रद्धालुओं ने गंगातट पर आकर माता के निमित श्राद्ध तर्पण किया। मातृ पक्ष की तिथि ज्ञात न भी हो तो भी मातृनवमी को माता का श्राद्ध किया जाता है। यह दिन माता के लिए शास्त्रों की ओर से निर्धारित किया गया है।
मातृनवमी पर श्रद्धालु कुशावर्त के साथ-साथ नारायणी शिला भी पहुंचे। श्राद्धों में नारायणी शिला पर भक्तों का आवागमन लगातार चल रहा है। माता के श्राद्ध के दिन आने वाले श्रद्धालुओं ने अपनी माता के साथ-साथ दादी, परदादी, नानी आदि का भी श्राद्ध किया। मातृनवमी को गुरु पत्नी के श्राद्ध की भी परंपरा है। श्राद्ध पक्ष में विभिन्न प्रकार के पकवान पंडितों को खिलाए जाते हैं। पितृ ऋण चुकाने के लिए मुख्य श्राद्ध पर मृत्यु तिथि पर होता है, किंतु पितृ श्राद्धों के दिन अज्ञात पितरों का श्राद्ध भी किया जाता है। जिन पितरों की तिथियों का ज्ञान न हो उनका श्राद्ध अमावस्या के दिन होता है, जबकि मातृ पक्ष का श्राद्ध बृहस्पतिवार को संपन्न कराया। गंगातट पर तर्पण करने वालों की भीड़ लगी रही। श्राद्ध के बाद ऋषियों को भी जल देकर तृप्त किया गया। अश्विन मास के कृष्ण पक्ष में पितृ लोक से पितृगण धरती पर आए हुए हैं। वे पुत्र से अन्न जल की कामना करते हैं।
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श्राद्ध पक्ष में पंच बलियों का विधान है। यह बलिया हैं गोबली, शानबली, काकबली, देवादि बली और पीपलिकादि बली। केवल काक बली पृथ्वी पर दी जाती है, जबकि अन्य चार बलियां पत्ते पर दी जाती हैं। बाद में इन्हें क्रमश: उन पशुओं को खिलाया जाता है, जिनके नाम पर बलिया बनी हैं। देवबली पवित्र नदियों के अर्पण की जाती है। पंचबली देने के बाद एक थाली में रसोई परोसकर दक्षिणाभिमुख होकर संकल्प करना चाहिए। महालय श्राद्धों में जल, अक्षत और तिल के माध्यम से बलि दी जाती है।
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