अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
16 दिनों के श्राद्धों को आम भाषा में कनागत भी कहा जाता है। इसका कारण सूर्य का राशि प्रवेश है। श्राद्धों के इन दिनों में आम श्राद्ध और तर्पण से कई प्रकार के श्राद्ध किए जाते हैं। श्राद्धाें में त्रिपिंडी श्राद्ध भी होता है, यद्यपि कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में वर्षभर त्रिपिंडी श्राद्ध की परंपरा कायम है।
16 दिनों के श्राद्धों के बीच में ही किसी न किसी दिन सूर्य अपनी पूर्व सिंह राशि छोड़कर कन्या राशि में प्रवेश करते हैं। इस बार 16 सितंबर को यह प्रवेश कन्या राशि में होगा। श्राद्धों का समापन 20 सितंबर को रहा है। जिस दिन सूर्य राशि परिवर्तन करेंगे उसी दिन पुष्य नक्षत्र विद्यमान रहेगा। चंद्रमा का प्रवेश उस दिन कर्क राशि में हो जाएगा। ज्योतिषीय एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध पक्ष में अतृप्त एवं भटकती आत्माओं का श्राद्ध भी किया जाता है। ज्योतिषाचार्य डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार भटकन के दौरान ऐसी आत्माएं अपने घरों में भी रहती हैं और अन्यत्र भी निवास करती हैं। ज्योतिष बताता है जिन घरों के दरवाजे दक्षिणमुखी होते हैं वहां यम की दिशा का प्रभाव पड़ता है। याद रहे कि पितरों का निवास भी दक्षिण में ही है और यमद्वार भी दक्षिण दिशा की ओर स्थित है। इन दिनों सूर्य अपने अर्द्धांश अर्थात कन्या राशि पर आ जाते हैं। इसी कारण श्राद्धों को कन्यागत अथवा कनागत भी कहा जाता है। ठीक वैसा भी प्रभाव तब होता है जब सूर्य गुरु की धनु राशि में प्रवेश करें। वे दिन पौष मास में आते हैं और उन दिनों भी भटकती आत्माओं की मुक्ति के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। इसमें पितृ दोष शांति, नारायण बलि, नागबलि, त्रिपिंडी आदि प्रमुख हैं। श्राद्धाें के दिनों में त्रिपिंडी श्राद्ध किया जाता है।
डा. प्रतीक मिश्रपुरी के अनुसार श्राद्ध करने से व्यक्ति की दरिद्रता मिट जाती है। राजभय, चोरभय, अग्निभय, दृष्टि आदि जाते रहते हैं। त्रिपिंडी श्राद्ध का ज्योतिष में बड़ा महत्व बताया गया है। अपयश, अशांति, अकाल मृत्यु, प्रेतबाधा, ब्रह्मबाधा आदि को त्रिपिंडी श्राद्ध से टाला जा सकता है।