कौशल सिखौला
हरिद्वार।
भारतीय संस्कृति मृतकों के प्रति भी कृतज्ञता ज्ञापित करती है। 16 दिनों के पितृ श्राद्ध यही भाव लेकर आते हैं। शास्त्रों की मान्यता है कि पितरों को देने के लिए पास में कौड़ी भी न हो तो दक्षिण दिशा की ओर मुंह कर दोनों हाथ उठाकर आंसू ही बहा दें। आंसू भी न निकलें तो आंख मूंद कर मृतकों को याद भर कर लें। धरती पर दक्षिण के पितृ लोक से आए सभी पितृगण संतृप्त हो जाएंगे।
देवों को मनाना भले कितना कठिन हो, पितरों को मनाना आसान है। चूंकि वे हमारे ही हैं। उन्हें केवल श्रद्धा भाव की दरकार है। पितृ तो भाव के भूखे हैं। 16 दिनों के श्राद्धों में प्रतिदिन दोपहर के समय यथा शक्ति भोजन कराने की परंपरा है। अमुक दिन जिस पितृ की तिथि हो, उसी पितृ के लिए निमित्त श्राद्ध तर्पण किया जाता है। शास्त्र कहते हैं कि इस दिन पितृ अपना भाग लेने के लिए पुत्र के द्वार पर आ खड़े होते हैं। वे दोपहर के समय ब्राह्मण भोजन के बाद पंडित के तृप्त होने पर संतृप्त होकर लौट जाते हैं। यद्यपि धरती पर उनका निवास पितृ पक्ष में रहता है, किंतु बाद में वे पुत्र से किसी जल की अपेक्षा नहीं करते। जिस तिथि में पितृ का निधन हो, उसी तिथि पर पितृ का श्राद्ध करना चाहिए। पूर्णिमा से अमावस्या तक पितरों को अर्घ्य प्रदान किया जाता है। यह अर्ध्य देवताओं के सामान होता है, किंतु इसे हव्य कहते हैं। श्राद्धों में पितरों के साथ-साथ कव्वों, श्वान, चींटियों, कीट, पतंगों आदि के लिए भी यथा संभव खाद्य पदार्थ दिए जाते हैं। अनेक पुराण और ज्योतिष शास्त्र बताते हैं कि दान में कोई भी प्रतिबंध नहीं है। किसी भी वर्ण और जाति का व्यक्ति अपने पितरों को जल प्रदान कर सकता है। कुशा के आसन पर पंडित को बिठाकर भोजन कराना चाहिए। तर्पण और श्राद्ध के समय उंगलियों में कुशा से बनी पवित्री पहनी जाती है। यह भी मान्यता है कि पितृ रात के अंधेरे में धरती पर आ जाते हैं। 16 ऱ्दिन बाद अमावस्या के दिन ढलते सूर्य की किरणों पर सवार होकर पितरों की वापसी पितृ लोक में होगी।