संदीप थपलियाल श्रीनगर। खुले में गोबर सड़ाकर खेतों में डाल खाद (ओपन हीप कंपोस्ट/मैन्योर) के रूप में प्रयोग करने का प्रचलन पुराना है। लेकिन अभी तक यह प्रमाणित नहीं है कि क्या वजह है कि गोबर की खाद रसायनिक खादों से बेहतर मानी जाती है। एचएनबी केंद्रीय गढ़वाल विवि श्रीनगर के बॉटनी एंड माइक्रोबायोलॉजी विभाग के शोध छात्र डा. अक्षत उनियाल ने सूक्ष्म जैविकी (माइक्रोबायोलॉजिकल) दृष्टिकोण से पारंपरिक ओपन हीप कंपोस्ट का जो अध्ययन किया है उसके मुताबिक उनका दावा है कि इसमें पौधों की वृद्धि में सहायक फंगस और बैक्टीरिया की बहुलता होती है। अक्षत ने विभागाध्यक्ष प्रो. एनएस बिष्ट के निर्देशन में यह अध्ययन किया।
अक्षत ने पारंपरिक गोबर की खाद (जैविक खाद) बनाने की विधि, उसकी उपयोगिता और पोषक तत्वों की मात्रा पर वर्ष 2011 से 2016 के बीच शोध किया। उन्होंने यह भी अध्ययन किया कि खाद को मिट्टी में मिलाने पर इसकी उर्वरा शक्ति पर कैसे असर पड़ता है। मिट्टी की रसायनिक, भौतिक एवं जैविक गुणों में क्या बदलाव आएंगे?
ऐसे किया अध्ययन
अध्ययन के दौरान हर 30 दिन के अंतराल पर खाद के नमूने लिए गए ताकि इसमे पाए जाने वाले माइक्रोब्स (सूक्ष्म जीव) के विकास का पता चल सके। खाद के नमूनों से मिले जीवाणु और कवक को कल्चर विधि से प्रयोगशाला में उगाया गया। खाद की भौतिक-रसायनिक विशेषताओं का अध्ययन करने के लिए प्रत्येक माह पोषक तत्वों की जांच की गई। इसे नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम, पीएच, इलेक्ट्रिक कंडक्टेंस और अन्य कई मानकों में परखा गया। फिर खाद को मिट्टी में डालने के बाद मिट्टी के नमूनों में जीवाणु व कवक, पोषक तत्वों में आए बदलाव, मिट्टी के रसायनिक-भौतिक गुणों में बदलाव और सूक्ष्म जीव जैव भार का अध्यन किया गया।
अध्ययन के परिणाम
गोबर के विघटन के दौरान तापमान नियंत्रित था जिससे अधिक से अधिक सूक्ष्म जीवों की वृद्धि और विकास हुआ। सूक्ष्म जीवों और कवकों की संख्या जितनी ज्यादा हुई, पोषक तत्वों की संख्या उतनी ही बढ़ती गई। सूक्ष्म जीवों ने अनुपयोगी तत्वों को उपयोगी पोषक तत्वों में बदल दिया। खाद में विघटन के दौरान एंटेरोबैक्टीरियेसी, बैसीलेसी, स्यूडोमोनाडेसी बैक्टीरिया और एसपरजिलस, पेनिसिलियम, अल्टरनेरिया, ट्राइकोडर्मा, कोरनीस्पोरा और टेलरेमाइसिस कवकों की बहुलता पाई गई। यह सभी पौधों की वृद्धि में सहायक पोषक तत्वों और हार्मोन्स के स्राव के लिए जिम्मेदार थे। ओपन हीप कंपोस्ट का तापमान (अधिकतम 48.5 डिग्री सेल्सियस), संतुलित पीएच, रसायनिक संरचना अधिकतम माइक्रोब्स के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराता है।
पहला शोध
पारंपरिक गोबर की खाद के मिट्टी पर प्रभाव का यह पहला विशिष्ट अध्ययन है। रसायनिक खाद भले ही पहले दौर में अच्छी पैदावार देती है। लेकिन रसायनिक खाद मिट्टी की उर्वरा शक्ति को समय के साथ नष्ट देती है। चिर स्थायी कृषि विकास (सस्टेनेबल एग्रीकल्चर) के लिए आधुनिक विधियों का पांरपरिक तरीकों के साथ समावेश कर बेहतर विकल्प तलाशा जा सकता है। प्रो. एनएस बिष्ट, विभागाध्यक्ष वनस्पति एंव सूक्ष्म जैविकी विज्ञान विभाग गढ़वाल विवि श्रीनगर