अमर उजाला ब्यूरो
हरिद्वार।
पहाड़ में ढोल-दमाऊं की गूंज के बिना कोई भी शुभ काम नहीं हो सकता। इसका उल्लेख ढोल सागर में भी दर्ज है। ढोल सागर में पर्वतीय शब्द का उल्लेख किया गया है।
पहाड़ में ढोल के महत्व का अंदाजा इससे ही लगाया जा सकता है कि यहां ढोल बजाने के सैकड़ों ताल प्रचलित हैं। संस्कृतिकर्मी गजेंद्र नौटियाल ने बताया कि ढोल सागर समेत कई अन्य ग्रंथों में कहा गया है कि पर्वतीय संस्कृति में बिना ढोल के शुभ कार्य की शुरूआत नहीं होती है। दंतकथाओं के अनुसार ढोल की उत्पत्ति शिव के डमरू से हुई है और ढोल सागर को सबसे पहले स्वयं शिव ने पार्वती को सुनाया था। जब वो इसे सुना रहे थे तब वहां मौजूद एक गण ने इसे कंठस्थ कर लिया। तब से ही ये पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक रूप से चला आ रहा है। वैसे मूल ग्रंथ संस्कृत और गढ़वाली बोली में है। ढोलसागर में प्रकृति, मनुष्य, देवताओं और त्योहारों को समर्पित 300 से ज्यादा ताल हैं।
जागर सम्राट प्रीतम भरतवाण का कहना है कि हमारी कोशिश इन वाद्यों और इन्हें बजाने वालों को पेशेवर रूप देकर इन्हें मान्यता दिलाने की है। ढोल नाद के जरिये कलाकारों को सम्मान और पैसा मिल जाए और लोककला की सुंदरता भी बरकरार रहे। बीते वर्षों में मंगनी-विवाह जैसे शुभ कार्य में तो ये हमारी संस्कृति का हिस्सा हुआ करते थे। पहाड़ में मंगनी और विवाह में दास मांगल बाजा बजा कर ख़ुशी की घड़ी के उत्साह को और बढ़ाने का रिवाज है। इतना ही नहीं मंगनी, सहपट्टा के दिन ढोल-दमाऊं वाले मेहमानों के स्वागत के लिए आते थे। वर पक्ष और कन्या पक्ष के अपने-अपने बाजगी होते हैं। वर पक्ष वाले जब घर से शुभ कार्य के लिए निकलते थे तो ढोल-दमाऊं-मशक बजा कर ख़ुशी का इजहार किया जाता था। ठीक उसी तरह कन्या पक्ष के बाजगी (दास) अपने यहां अतिथियों का ढोल से आदर करते हुए अगवानी करते थे। शादी में ढोल-दमाऊं वाले बाजगी साथ चलते थे। लड़की वालों के यहां उनके बाजगी मौजूद रहकर मेहमानों के सम्मान में ढोल बजाते थे। रात होने पर दास नौबत लगाते थे। नोबत ढोल-दमाऊ की विभिन्न थाप के जरिये बजाये जाने वाले कुछ विशेष ताल होते थे। इनमे सबसे पहले भूमि के भुम्याल और देवताओं के आह्वान के बाजे कई तालों में बजाये जाते थे। रात को नौबत में भूत-मशाण के भी ताल बजाये जाते हैं। मंगल कार्य के संदेश संबंधी कई ताल ढोल से बजाए जाते हैं। ये लोग ढोल सागर के जानकार होते थे। ढोल एवं ढोली को मेहमानों जैसी ही पिंठाई लगाई जाती थी।
दर्जन भर वाद्य अब ढोल, दमाऊ, हुड़का, मुर्छुंद, थाली, करनाल, मशकबीन, अलगोजा, डाैंर, दांया और बांया नगाड़ा, फंकोरे, रणसिंघा तथा स्कॉटिश बैगपाइप की संगत कराई गई है। स्कॉटिश बैगपाइप तो अंग्रेजों के जमाने में सेना के जरिये यहां पंहुचा फिर यहीं के वाद्य परिवार में शामिल हो गया। इससे लुप्त हो रहे कई साजों और धुनों को एक नया जीवन मिल गया है।
मांगल गायन की कला भी तोड़ रही दम
संस्कृतिकर्मी गजेंद्र नौटियान के अनुसार उत्तराखंड के तमाम ग्रामीण इलाकों में शुभ कार्यों के दौरान ढोल और दमाऊं बजाने वालों की घरेलू महिलाओं को मांगल गायन के लिए बुलाया जाता था लेकिन अब गढ़वाल क्षेत्र में चंबा को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में यह विधा दम तोड़ रही है। उन्होंने सरकार से इस विधा को भी संरक्षण देने की मांग की है।