श्रीनगर। राज्य में रियायती शिक्षण शुल्क (सब्सिडाइज्ड फीस) पर मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं के लिए अति दुर्गम क्षेत्र में सेवा की शर्त अब हटा दी गई है। इस स्थिति में दुर्गम इलाकों डाक्टर की तैनाती आसान नहीं होगी। अब राज्य के सरकारी मेडिकल कालेजों से पास आउट होने वाले बांडेड डॉक्टरों को पहले साल राज्य के नौ जिलों (देहरादून, हरिद्वार व ऊधमसिंह नगर छोड़कर) के जिला अस्पतालों/बेस अस्पतालों में तैनात किया जाएगा। अगले चार साल डॉक्टर उसी जिले के सामुदायिक अस्पतालों में सेवा देंगे। पहले एमबीबीएस करने के बाद बांडेड डॉक्टर एक साल संबंधित कालेज के अस्पताल में जेआरशिप करते थे। इसके बाद दो साल उनकी दुर्गम/अति दुर्गम अस्पतालों में पोस्टिंग की जाती थी।
बता दें कि प्रदेश सरकार ने प्रदेश सरकार ने रियायती शिक्षण शुल्क पर मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राओं के कंपल्सरी सर्विस बांड (अनिवार्य सेवा अनुबंध) में फिर बदलाव किया है। बांड का उल्लंघन करने पर बांडेड एमबीबीएस को दो करोड़ रुपये के बजाय एक करोड़ रुपये भरने होंगे। वहीं, सरकारी अस्पतालों में अनिवार्य सेवा भी पूर्व की भांति तीन वर्ष के बजाय पांच वर्ष कर दी गई है।
अब यह हैं बांड की शर्तें
23 जुलाई 2008 को शासनादेश जारी करते हुए अनिवार्य सेवा न करने वाले एमबीबीएस डॉक्टर को हर्जाने के रुप में एकमुश्त 30 लाख रुपये जमा कराने के लिए कहा गया था। इसके बाद 23 मई 2013 को इसमें संशोधन करते हुए नया शासनादेश जारी हुआ। इसमें अभ्यर्थी की ओर से दो श्योरटीज भी बांड में हस्ताक्षर करते हैं, जिसमें अभ्यर्थी और श्योरटीज यह शपथ लेते हैं कि अनुबंध तोड़ने पर वह साढ़े चार साल का मेडिकल का शिक्षण शुल्क (प्रतिवर्ष चार लाख रुपये) चक्रवृद्धि ब्याज की दर से जमा करा देंगे। 20 जनवरी 2015 को फिर जीओ जारी कर बांडेड डॉक्टरों की बांड धनराशि दो करोड़ रुपये कर दी गई। अब बांडेड धनराशि दो करोड़ से घटाकर एक करोड़ कर दी गई है।
नए सत्र से होगा लागू
शासन से नए दिशा-निर्देश मिले हैं। नई शर्तें शैक्षणिक सत्र 2017-18 से लागू होंगी।
प्रो. अमित सिंह, प्रभारी प्राचार्य राजकीय मेडिकल कॉलेज श्रीनगर