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जब-जब बार-बार करुण कंदन कर उठे गंगा के पाषाण

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कौशल सिखौला
हरिद्वार।
पूरे विश्व में दुष्टों का दलन कर हरकी पैड़ी पहुंचे विष्णु के अवतार भगवान परशुराम ने पहली कांवड़ यहीं से उठाई थी। त्रेता युग में हुई उस घटना से आज तक वर्ष में दो बार कांवड़ यात्रा सतत चल रही है। देश के अधिकांश शिवालयों में हरकी पैड़ी से ले जाए गए शिवलिंग ही विराजमान हैं। आरंभ में गंगा के पाषाण मां का आंचल छोड़ने को तैयार नहीं हुए। परशुराम की ओर से प्रतिवर्ष दो बार यहां से गंगाजल पाषाणों पर चढ़ाने का वचन देने के बाद शिवलिंग के रूप में स्थापित होने के लिए गंगा के पत्थर उनके साथ गए थे। तब से अनादि परशुराम ही शिवालयों में पहली कांवड़ चढ़ाते आ रहे हैं।
विभिन्न धर्म ग्रंथों में उपलब्ध आख्यानों के अनुसार यह कांवड़ यात्रा त्रेता से पहले नहीं थी। प्रमुख वैदिक विद्वान डा. आरडी शर्मा विद्या वाचस्पति के अनुसार दुष्ट राजाओं का दलन करने के बाद परशुराम जब अपने मयराष्ट्र पहुंचे तब ब्रह्मांड से आकाशवाणी हुई कि इसी राष्ट्र में मेरा लिंग स्थापित किया जाए। तब परशुराम हरकी पैड़ी गंगातट पर पहुंचे और गंगा से पाषाण उठाने लगे। जैसे ही परशुराम ने गंगा के पत्थरों को बाहर निकाला, पत्थर झार-झार रोने लगे। पत्थरों ने कहा कि गंगा हमारी माता है, हमें मां से अलग न करो। भगवान परशुराम का भी दिल पसीज गया। उन्होंने मां गंगा की आराधना शुरू की। परशुराम का प्रेम देखकर गंगा प्रकट हुई और परशुराम से आगमन का कारण पूछा। परशुराम ने बताया कि गंगा से एक पाषाण लेकर अपने वतन मयराष्ट्र स्थापित करना चाहते हैं। यह पत्थर साथ जाने को तैयार नहीं हैं। तब गंगा ने पत्थरों को आश्वासन दिया कि वे बिछुड़ कर भी उनसे दूर नहीं रहेंगे। परशुराम ने आश्वस्त किया कि वे प्रत्येक फागुन और प्रत्येक श्रावण में इसी हरकी पैड़ी से गंगाजल लेकर शिवलिंग पर चढ़ाएंगे। बाद में परशुराम ने एक पाषाण लेकर मयराष्ट्र के वर्तमान पुरा महादेव में स्थापित किया। बाद में गंगा से अनेक पाषाण लेकर परशुराम ने देश के विभिन्न शिवालयों में स्थापित किए। तब से दोनों कांवड़ यात्रा के दौरान पहली कांवड़ भगवान परशुराम ही चढ़ाते हैं। कांवड़ यात्रा का सबसे बड़ा मेला बागपत के पुरा महादेव मेें भरता है।
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कांवड़ यात्रा का कुछ अन्य शास्त्रों में भी उल्लेख है। अलबत्ता इसका वह स्वरूप नहीं जो आज है। कांवड़ यात्रा का किसी न किसी रूप में जल यात्रा के रूप में मत्स्य पुराण, स्कंद पुराण, विष्णु पुराण आदि उल्लेख किया है। गंगा सहस्त्रनमावाली में ही कांवड़ यात्रा का एक स्वरूप विद्यमान है। याद रहे कि गंगातट पर आने वाला प्रत्येक यात्री लौटते हुए गंगाजल लेकर अवश्य जाता है। इसका उद्देश्य यह होता है कि पर्वों के अवसर पर भगवान शिव तथा अन्य देवों का अभिषेक किया जा सके। भगवान परशुराम ने जो शिवलिंग पुरा महादेव में स्थापित किया था यह जानकर आश्चर्य होगा कि उसकी स्थापना का मुहूर्त स्वयं अनादि वाल्मीकि ने निकाला था। यहीं नहीं हरकी पैड़ी से ले जाए गए पाषाण की स्थापना भी भगवान वाल्मीकि ने ही कराई थी। परशुराम के आने के बाद हरकी पैड़ी का एक नाम ब्रह्मणस्पति परशुराम के नाम पर ब्रह्मकुंड़ भी पड़ गया। यह तीर्थ सनातन है और गंगा तथा शिव की महिमा भी अनंत है।
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