पांच आईसीयू पर 15 लाख जिंदगियों का बोझ। तिल-तिल कर मरते मरीजों की लंबी कतार और अस्पताल में एक भी बेड खाली नहीं। ऐसी स्थिति में मजबूरी और मुफलिसी के चलते सरकारी अस्पताल में उपचार कराने पहुंच रहे मरीज निराश होकर लौट रहे हैं।
खुद को जिंदा रखने के लिए उन्हें प्राइवेट अस्पतालों का सहारा लेना पड़ा है, जिसकी कीमत वे अपनी जीवन भर की कमाई लुटाकर चुका रहे हैं। यह तस्वीर प्रदेश के किसी दूरस्थ, दुर्गम और सीमांत क्षेत्र की नहीं, बल्कि राजधानी की है। वही राजधानी जहां मुख्यमंत्री, स्वास्थ्य मंत्री से लेकर तमाम बड़े अधिकारी और वीआईपी निवास करते हैं। वही राजधानी जहां स्वास्थ्य विभाग का पूरा ढांचा खड़ा है।
देहरादून प्रदेश की राजधानी होने के साथ बेहद महत्वपूर्ण जिला भी है। ऋषिकेश-मसूरी से चकराता-उत्तरकाशी के सीमांत क्षेत्र तक फैले जिले की आबादी करीब 15 लाख है। इतनी बड़ी आबादी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने के दावे के साथ अलग-अलग स्थानों पर कई स्वास्थ्य केंद्र व अस्पताल खोले गए हैं। लेकिन सुविधाओं, चिकित्सकों और स्टाफ की किल्लत के चलते ये महज शोपीस साबित हो रहे हैं।
उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के मरीजों का भी भार
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आलम यह है कि पूरे जिले में केवल राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल में ही इंटेंसिव केयर यूनिट (आईसीयू) बेड की सुविधा उपलब्ध है। वहीं, अस्पताल में इंटेंसिव कॉर्डिनरी कार्डियक यूनिट (आईसीसीयू) के सात और सर्जिकल आईसीयू के पांच बेड उपलब्ध हैं। राजकीय दून अस्पताल पर केवल दून ही नहीं, बल्कि गढ़वाल और पड़ोसी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के मरीजों का भार भी है।
केस : एक
श्रीनगर गढ़वाल निवासी जेपी लखेड़ा को बेस अस्पताल से दून रेफर किया गया। परिजन राजकीय दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल पहुंचे तो आईसीयू में बेड खाली नहीं होने के चलते उन्हें भर्ती नहीं किया जा सका। इसके बाद परिजन पटेलनगर स्थित निजी अस्पताल पहुंचे। वहां भी बेड खाली नहीं मिला। अंत में परिजन उन्हें लेकर हरिद्वार बाईपास स्थित निजी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां बमुश्किल आईसीयू में बेड मिल सका।
केस : दो
मोहकमपुर निवासी भावना गैरोला को तबीयत बिगड़ने के बाद चिकित्सकों ने आईसीयू में रेफर करने की सलाह दी। दून मेडिकल कॉलेज अस्पताल की आईसीयू में बेड खाली नहीं होने के चलते प्राइवेट अस्पताल ले जाना पड़ा। दो बड़े अस्पतालों में परिजन मरीज को लेकर पहुंचे, लेकिन दोनों जगह आईसीयू में बेड नहीं होने की बात कहकर उन्हें लौटा दिया गया। बाद में उन्हें ईसी रोड स्थित एक अस्पताल में भर्ती कराया गया है।
नहीं मिल रहे आईसीयू में बेड
- फोटो : अमर उजाला
मरीजों की संख्या अधिक होने के चलते इन दिनों आईसीयू में बेड नहीं मिल रहे हैं। गरीब और अभावग्रस्त मरीज आईसीयू के बिना दम तोड़ रहे हैं, जबकि अन्य मरीज मजबूरी में प्राइवेट अस्पतालों का रुख कर रहे हैं।
बृहस्पतिवार को भी आईसीयू बेड के लिए मरीजों के तीमारदारों ने अस्पताल में पूछताछ की, लेकिन बेड फुल होने के चलते उन्हें जगह नहीं मिल सकी। प्राइवेट अस्पतालों में भी आईसीयू बेड आसानी से नहीं मिल पा रहे हैं। वहीं, आईसीयू के नाम पर मनमाना शुल्क अलग वसूला जा रहा है।
अन्य अस्पतालों में नहीं आईसीयू
राजकीय दून मेडिकल कॉलेज टीचिंग अस्पताल को छोड़कर जिले के किसी भी सरकारी अस्पताल में आईसीयू की सुविधा नहीं है। लंबे समय से ऋषिकेश, मसूरी, विकासनगर, कोरोनेशन और प्रेमनगर अस्पताल में भी आईसीयू की आवश्यकता महसूस की जाती रही है। इसके बावजूद आज तक यहां आईसीयू की सुविधा उपलब्ध नहीं हो पाई है। दूसरी ओर दुर्घटना और आपदा को देखते हुए अलग-अलग स्थानों पर ट्रॉमा सेंटर बनाए जाने की योजना थी, जिस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
फिलहाल आईसीयू बेड बढ़ाने का कोई प्रस्ताव नहीं है। जबकि ट्रॉमा सेंटर का मैन पावर की कमी ना होने के कारण संचालन नहीं हो पा रहा है।
- डॉ. कुसुम नरियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक