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तेरह साल में उत्तराखंड का हुआ यह हाल

Sat, 09 Nov 2013 12:03 PM IST
अमर उजाला, देहरादून
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उत्तराखंड को यूपी से अलग हुए 13 साल बीत चुके हैं। इन तेरह सालों में जहां एक तरफ उत्तराखंड को कई उपलब्धियां मिली हैं।
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वहीं दूसरी ओर प्रदेश को कई परेशानियों का सामना भी करना पड़ा है। ये हैं उत्तराखंड की 13 सालों की उपलिब्ध्यों और भविष्य में आने वाली चुनौतियां---

13 साल की उपलब्धियां
18 फीसदी तक पहुंची थी विकास दर
राज्य के गठन के समय विकास दर 1.19 के करीब थी जो वर्तमान में दस प्रतिशत के आसपास है। हालांकि एक समय यह 18 प्रतिशत तक भी पहुंची थी।

35 हजार करोड़ का पूंजी निवेश
गठन के साथ ही राज्य में करीब 35 हजार करोड़ का पूंजी निवेश हुआ था। 13 सालों में औद्योगिक क्षेत्र में विकास हुआ है। पूंजी निवेश में लगातार इजाफा हुआ है, हालांकि शुरुआती रफ्तार मद्धिम पड़ गई है।

जीईपी की पहल करने वाला पहला राज्य
सकल पर्यावरणीय उत्पाद को विकास का मानक बनाने को लेकर राज्य ने घोषणा कर देश में पहल की। अगर ऐसा हुआ तो राज्य को विकास के लिए और संसाधनों की मदद मिल सकेगी।
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बना रहा जंगल का रकबा
राज्य गठन के बाद वनों की अवैध कटान को लेकर सवाल जरूर उठे लेकिन इन 13 सालों में 63 प्रतिशत का आंकड़ा जस का तस रहा। कई राज्यों में तेजी से घटते वनों के रकबे के मुकाबले यहां की स्थिरता संतोषजनक है।

एजूकेशन हब की बनी पहचान
13 सालों में राज्य ने एजुकेशन हब के रूप में पहचान को और मजबूती दी। छह विश्वविद्यालय खुले। यहां के  नए-पुराने पब्लिक स्कूलों ने परंपरा को आगे बढ़ाते हुए देश-विदेश में पहचान को बरकरार रखा।

99 फीसदी स्थानों पर बिजली
ऊर्जा प्रदेश में बिजली की सप्लाई सभी स्थानों पर सुनिश्चित नहीं हो पाई है परंतु गांवों तक बिजली के तार बिछाने का काम लगभग पूरा है। आंकड़ों के मुताबिक 99 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है।

ऋण-जमा अनुपात 58 फीसदी
बैंकिंग के क्षेत्र में गठन के समय ऋण जमा अनुपात सिर्फ 22 प्रतिशत था जो 58 प्रतिशत तक हो गया है। वहीं वित्तीय समावेश के तहत प्रदेश के प्रत्येक परिवार का एक सदस्य बैंकिंग नेटवर्क से जुड़ा है।

बिजली का उत्पादन बढ़ा
राज्य गठन के समय उत्तराखंड से करीब 800 मेगावाट का उत्पादन होता था। जो बढ़कर करीब 3500 मेगावाट हो गया है। हालांकि आत्मनिर्भरता के लिए काफी प्रयास करने होंगे।

साक्षरता बढ़ी
साक्षरता दर महिलाओं और पुरुषों, दोनों में बढ़ी है। साक्षरता दर करीब 80  प्रतिशत तक पहुंच गई है। राज्य गठन के वक्त यह दर काफी कम थी।

मृत्युदर भी काफी कम हुई
शिशु मृत्यु दर कम करने में राज्य ने काफी प्रयास किया है। 2000 में यह 52 था जो घटकर 30 पहुंच गया है। हालांकि पहाड़ी जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं अब भी काफी लचर स्थिति में हैं।

वार्षिक प्लान चौगुने से ज्यादा
राज्य गठन के समय वार्षिक प्लान लगभग 2 हजार करोड़ था। जो अब बढ़कर 8 हजार 8 सौ करोड़ हो गया है। इंफ्रास्ट्रक्चर में भी काफी विकास हुआ है लेकिन प्रगति के पथ पर राज्य को बहुत दूर जाना है।

खाद्य सुरक्षा देने वाला राज्य
खाद्य सुरक्षा अधिनियम लागू कर देश के चुनिंदा राज्यों में शामिल हुआ है। लेकिन इसके लाभ से पूरे राज्य को संतृप्त करना बाकी है। इसलिए यह एक बड़ी चुनौती भी है।

राजस्व में भी चौगुने से ज्यादा वृद्धि
राज्य गठन के समय राजस्व मात्र 8 सौ करोड़ था जो वर्तमान में करीब 33 सौ करोड़ हो गया है। देश में सबसे पहले 2005 में वैट लागू करके राज्य ने अपनी आर्थिक दशा बेहतर बनाई। वर्तमान में कुल राजस्व का 70 प्रतिशत हिस्सा वैट से मिलता है।

राज्य के समक्ष 13 चुनौतियां
आपदा प्रबंधन एवं पुनर्निर्माण
पर्वतीय जनपदों में प्राकृतिक आपदा का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ है जो थमता नहीं दिख रहा है। बीते वर्षों से सबक न लेने के कारण जून 2013 में आई त्रासदी ने पहाड़ों को झकझोर दिया है।

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आपदा के बाद पुनर्निर्माण एवं पुनर्वास की कार्ययोजना को धरातल पर लाने में हो रही देरी एक बड़ी चिंता है।

पलायन से वीरान होते पहाड़
पर्वतीय प्रदेश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि पहाड़ों से रोजी-रोटी की तलाश में वहां की आबादी बढ़ी संख्या में मैदानों और दूसरे राज्यों में जा रही है। सीमित संसाधनों और दिशाहीन विकास के चलते सभी पहाड़ी जनपद पलायन की जद में हैं। सरकार के विकास को लेकर कोरे दावों से जनता का विश्वास उठ चुका है।

सैकड़ों गांवों का पुनर्वास
राज्य में सरकार ने पौने तीन सौ गांव चिन्हित किए हैं जिन्हें विस्थापित कर पुनर्वास करना है। कई बरसों से इन गांवों के विस्थापन के लिए करोड़ों रुपये केंद्र से मांग रही है। हैरानी इस बात की है जब योजना आयोग ने पुनर्वास और विस्थापन की कार्ययोजना मांगी तो राज्य सरकार देने में असमर्थ रही।

युवाओं को रोजगार के अवसर
राज्य में रोजगार के अवसर सृजित करने के लिए अब तक न कोई ठोस नीति बनी न इस दिशा में पर्याप्त प्रयास हुए। राज्य में लगभग 6.6 लाख पंजीकृत बेरोजगार हैं। बेराजगारी दर राज्य में 4.9 फीसदी है, लेकिन यह संख्या लगातार बढ़ रही है।

कमजोर आधारभूत ढांचा
राज्य में स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, रेल, बिजली, पेयजल, शहरी विकास, संचार आदि को विकसित करने में सर्वाधिक जोर देना होगा। पर्वतीय जनपदों में मूलभूत सुविधाओं का टोटा लगातार बना हुआ है। नियमित पेयजल और बिजली की समस्या को पार पाने के साथ डॉक्टर, मास्टर को पहाड़ चढ़ाना होगा।

औद्योगिक विकास को गति देना
राज्य में उद्योगों को आकर्षित करने के लिए पर्यटन, हायर एजूकेशन, आईटी, फूड प्रासेसिंग और बायोटेक्नोलाजी की अपार संभावनाएं है। इस क्षेत्रों के लिए सरकार ने सिडकुल वन और टू तो लांच किए लेकिन निवेशकों को आकर्षित करने के लिए बेहतर सड़क, रेल, हवाई मार्ग आदि ढांचागत सुविधाएं विकसित करना बाकी है।

कृषि और बागवानी
कृषि क्षेत्र में राज्य बेहद कमजोर साबित हुआ है, जबकि चार एग्री एक्सपोर्ट जोन चिन्हित हैं। तराई के क्षेत्रों में गन्ना उत्पादन घटा है। हार्टीकल्चर को राज्य में प्रसारित करने के लिए कोई विशेष कदम नहीं उठाया गया। पहाड़ों में फ्लोरीकल्चर और औषधीय पौधों की खेती की अपार संभावनाएं तलाश जाना अभी बाकी है।

पर्यटन एवं तीर्थाटन को बढ़ावा
राज्य में न केवल पर्यटन बल्कि तीर्थाटन की संभावनाएं मौजूद हैं। चार धाम यात्रा मुख्य आकर्षण होने के बावजूद राज्य सरकारी की अनदेखी झेल रहा है। हरिद्वार व ऋषिकेश में धार्मिक पर्यटन के तौर पर सुविधा संपन्न बनाना जाना जरूरी है। पर्यटकों के लिए साहसिक खेलों के स्थान चिन्हित कर उन्हें विकसित करना होगा।

अछूता ऊर्जा का क्षेत्र
ऊर्जा प्रदेश के तौर पर उत्तराखंड को विकसित किये जाने की बात सरकारें करती रही हैं, लेकिन अब तक यह मुद्दा विवादों में अधिक रहा है। जलविद्युत योजनाओं में 30 हजार मेगावाट क्षमता के दोहन में महज चार हजार मेगावाट जेनरेट हो पा रहा है।

आयुष प्रदेश की सपना
उत्तराखंड को आयुष प्रदेश बनाने को लेकर राजनीतिक तौर पर कई दावे हुए लेकिन अभी तक इसमें कामयाबी नहीं मिली है। आयुष ग्राम स्थापित करने की योजना नाकाम रही है।

बार्डर एरिया डेवलपमेंट
राज्य की लंबी सीमा चीन और नेपाल से जुड़ी हुई है। इस सीमा के साथ क्षेत्रों को मूलभूत सुविधा संपन्न बनाने के बढ़ी जरूरत है। केंद्र से इसके लिए विशेष पैकेज की मांग लंबे अरसे से हो रही है लेकिन उसकी मजबूत पैरवी की जरूरत है।

12 ग्रीन बोनस को हासिल करना
राज्य का दो-तिहाई हिस्से में जंगल हैं। प्रदेश की ओर से लगातार एक हजार करोड़ रुपये के ग्रीन बोनस की मांग की जा रही। अब जीईपी को मापक बनाकर उत्तराखंड के योगदान को मापने की बात उठ रही है, लेकिन उसको लागू करना आसान नहीं है।
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13 कर्मचारियों की स्थानांतरण नीति
राज्य में लगभग दो लाख नियमित कर्मचारी हैं इनके सुगम दुर्गम में स्थानांतरण को लेकर हर साल विवाद की स्थिति बनी रहती है। कर्मचारी पहाड़ चढ़ना नहीं चाहते और सरकार उनको स्थानांतरित करने में हमेशा असहाय दिखती है। मैदान-पहाड़ में कर्मचारी तैनाती को लेकर ठोस और तर्कसंगत स्थानांतरण नीति जरूरी है।

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