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...तो अब ‘जीवनदायिनी’ नहीं, केवल मरीज ढोने वाली गाड़ी रहेगी 108

Sat, 20 Apr 2019 10:21 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, देहरादून
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108 - फोटो : अमर उजाला
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डॉक्टरों और सहायक स्टाफ की कमी से जूझ रहे पहाड़ों में 108 एंबुलेंस जीवनदायिनी ही है। 108 के प्रशिक्षित कर्मचारी न केवल लोगों को प्राथमिक उपचार देकर निकटवर्ती सरकारी अस्पतालों तक पहुंचाते रहे हैं बल्कि जरूरत पड़ने पर गर्भवती महिलाओं का प्रसव कर जच्चा-बच्चा को नया जीवन भी देते रहे हैं। यही कारण है कि पहाड़ में 108 को जीवनदायिनी कहा जाता है। लेकिन, अब यह जीवनदायिनी नहीं, केवल मरीजों को दुर्घटनास्थल से अस्पताल तक ढोने वाला वाहन रहेगा।

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संचालन का जिम्मा संभालने जा रही नई कंपनी (कैंप कंपनी) के प्रभारी प्रदीप राय का स्पष्ट कहना है कि एंबुलेंस इलाज करने या डिलीवरी कराने के लिए नहीं है। हमारा काम केवल मरीज को अस्पताल तक पहुंचाना है। कंपनी का यह रुख तब सामने आया है जब अमर उजाला ने केवल तीन दिन के प्रशिक्षण के बाद कर्मचारियों को फील्ड में उतारने पर सवाल किया। दरअसल, कैंप कंपनी को प्रदेश में 108 सेवा के संचालन का जिम्मा मिला है। इसके लिए कंपनी नए कर्मचारियों की भर्ती कर रही है। लेकिन, भर्ती कर्मचारियों को केवल तीन दिन का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। ऐसे में सवाल उठाए जा रहे हैं कि आखिर तीन दिन में कर्मचारी सड़क दुर्घटना जैसे हादसों के गंभीर मरीजों को कैसे उपचार दे पाएंगे।

108 में 12 हजार से ज्यादा बच्चे हुए पैदा
प्रदेश में वर्ष 2008 में आपातकालीन सेवा 108 शुरू हुई थी। किसी भी आपात स्थिति से अलग यह प्रसव के दौरान पहाड़ की महिलाओं के लिए जीवनदायिनी साबित हुई है। पिछले 11 वर्षों की बात करें तो 108 की मदद से 3.40 लाख गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचाया गया। जबकि, लगभग 11-12 हजार महिलाओं ने 108 एंबुलेंस में बच्चों को जन्म दिया। इस हिसाब से प्रतिवर्ष तकरीबन एक हजार से भी ज्यादा और प्रतिदिन तीन से चार महिलाओं का एंबुलेंस में प्रसव हुआ।
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क्यों जरूरी है प्रशिक्षित स्टाफ
पहाड़ों में चिकित्सकों की कमी किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में एंबुलेंस में ही प्रशिक्षित स्टाफ का होना जरूरी है। जबकि, प्रशिक्षण की बात पर कैंप कंपनी के प्रभारी प्रदीप राय यह कहकर बच रहे हैं कि एंबुलेंस में प्रसव नहीं होते, यह सिर्फ मरीज को अस्पताल लाने-ले जाने के लिए होती है। उन्होंने बताया कि यदि दुर्लभ मामलों में ऐसा होता है तो तीन दिन का प्रशिक्षण कर्मचारियों को दिया जा रहा है। महिला स्टाफ भी भर्ती किया गया है। अब यह स्टाफ और इसकी काबिलियत कितनी सही है यह आने वाला समय बताएगा। फिलहाल, अपनी कार्यशैली और भर्ती प्रक्रिया को लेकर कंपनी पर अभी से सवाल उठने लगे हैं।

हमने पहले पूछा था तो कंपनी ने भर्ती कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिए जाने की बात कही थी। अब यह प्रशिक्षण तीन दिन का है या ज्यादा, इसकी जानकारी नहीं है। कंपनी ने 60 फीसदी पुराना स्टाफ भर्ती करने की बात भी कही थी। इसमें अब देखने वाली बात यह होगी कि कौन सा स्टाफ कहां और किस पद पर रखा गया है।
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-डॉ. रविंद्र थपलियाल, स्वास्थ्य महानिदेशक उत्तराखंड

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