ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
गोपाष्टमी पर कालिका माता समिति की ओर से कालिका मंदिर में 108 गायों की विशेष पूजा अर्चना की गई। साथ ही गायों के लिए ग्वालों को बाल्टी और घंटी भी प्रदान की गई। गोपाष्टमी पर सबसे पहले मंदिर में गाय और बछड़े को नहलाकर कर उनका शृंगार किया गया।
इसके बाद गो भक्तों ने गाय की पूजा की। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण ने गो चारण लीला शुरू की थी। शुक्रवार को मंदिर में कथा का आयोजन किया गया। कथा वाचक आचार्य देवेंद्र उपाध्याय ने श्रीकृष्ण जन्म की कथा सुनाते हुए कहा कि जब-जब पृथ्वी पर अत्याचार बड़ा है, सदाचार स्थापना के लिए भगवान मनुष्य रूप लेकर धरती पर आए हैं। उन्होंने कहा कि माता देवकी की आठवीं संतान के रूप में भगवान श्रीकृष्ण कारागार में ही प्रकट हुए। वासुदेव उन्हें गोकुल नंद भवन में छोड़कर वहां से कन्या लेकर मथुरा पहुंच गए। उस कन्या को जब कंस ने मारना चाहा तो वह दुर्गा का रूप लेकर अदृश्य हो गई।
इस मौके पर गगन सेठी, रमेश साहनी, एलडी भाटिया, राम स्वरुप भाटिया, उमेश मिनोचा, सतीश कक्कर, नंद कुमार आनंद, केवल आनंद, अशोक मित्तल, नरेश मैनी, महेश डोरा, शशि तलवार, सतीश शर्मा, कुंवर राजेंद्र वर्मा, जय किशन कक्कर, महेश ग्रोवर, पंडित चंदर प्रकाश ममगाईं, हरीश कक्कर, विजय अरोरा आदि मौजूद रहे।
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श्रीकृष्ण ने की थी गाय चराने की जिद
ज्योतिषाचार्य गौरव आर्य ने बताया कि पौराणिक कथा के अनुसार जब श्रीकृष्ण भगवान ने अपने जीवन के छठे वर्ष में कदम रखा। तब वे अपनी मैया यशोदा से जिद करने लगे कि वे अब बड़े हो गये हैं और बछड़े को चराने के बजाय वे गाय को चराना चाहते हैं। उनके हठ के आगे मैया को हार माननी पड़ी। मैया ने उन्हें अपने पिता नंद बाबा के पास इसकी आज्ञा लेने भेज दिया। नंद बाबा गैया चराने के मुहूर्त के लिए शांडिल्य ऋषि के पास पहुंचे। इस पर बड़े अचरज में आकर ऋषि ने कहा कि अभी इसी समय के अलावा अगले बरस तक कोई भी शुभ मुहूर्त नहीं हैं। वह दिन गोपाष्टमी का था। जब श्रीकृष्ण ने गैया पालन शुरू किया। उस दिन माता ने अपने कान्हा को बहुत सुंदर तैयार किया। गौ चरण करने के कारण ही भगवान कृष्ण को गोपाल या गोविंद के नाम से भी जाना जाता है।