ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
खराब सड़क, गड्ढे या अन्य किसी समस्या के कारण अगर सड़क दुर्घटना में किसी की मौत होती है तो तत्काल संबंधित एजेंसियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया जाए। ऐसे मामलों में पुलिस आईपीसी की धारा 304 (ए) ही नहीं, बल्कि 304 में भी केस दर्ज करे, ताकि आरोपियों को जमानत भी न मिल सके। बृहस्पतिवार को पुलिस लाइन सभागार में रोड टू सेफ्टी कार्यशाला के शुभारंभ अवसर पर एडीजी अशोक कुमार ने यह बात कही।
यातायात और सीपीयू कर्मियों को संबोधित करते हुए उन्होंने व्यवस्था सुधारने के लिए नई कार्ययोजना अपनाने का आह्वान किया। साथ ही कहा कि केवल बिना हेलमेट वालों का चालान करने भर से कुछ नहीं होगा। दुर्घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए पहले ओवर स्पीड, ओवरलोड और ड्रिंक एंड ड्राइव रोकना होगा। उन्होंने कहा कि यातायात कर्मियों की बेहतर ट्रेनिंग के लिए इस साल अंत तक ट्रैफिक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर खोलने का प्रयास है, जिसमें साल के चार से पांच ट्रेनिंग प्रोग्राम चलाए जाएंगे।
डीआईजी गढ़वाल पुष्पक ज्योति ने यातायात व्यवस्था सुधार के लिए आम लोगों से सहयोग की अपील की। उन्होंने कहा कि दून में बिना सीट बेल्ट गाड़ी चलाने वाले दिल्ली या चंडीगढ़ की सीमा में घुसने से पहले ही बेल्ट बांध लेते हैं। यह सेंस उन्हें यहां भी विकसित करना होगा। इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन (आईआरटीई) के निदेशक डॉ. रोहित बलूजा ने शहर की यातायात व्यवस्था में सुधार के लिए कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए। डिआजियो के सीजीएम नवदीप सिंह मेहरम ने यातायात पुलिस को स्कूल और कॉलेजों में यातायात जागरुकता कार्यक्रम अनिवार्य करने का सुझाव दिया। कार्यक्रम में यातायात निदेशक केवल खुराना, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक निवेदिता कुकरेती, एसपी ट्रैफिक लोकेश्वर सिंह समेत अन्य पुलिस, यातायात व सीपीयू कर्मी मौजूद रहे।
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दून की टाउन प्लानिंग हुई न ट्रैफिक प्लानिंग
आईआरटीई ने 2020 तक वैकल्पिक सड़कें और फ्लाईओवर बनाने का दिया सुझाव
देहरादून (ब्यूरो)। शहर तेजी से विस्तार ले रहा है, लेकिन इसके सापेक्ष न तो टाउन प्लानिंग की जा रही है और न ही ट्रैफिक प्लानिंग पर ध्यान दिया जा रहा है। लिहाजा इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं। 2020 तक अगर इसमें सुधार नहीं किया गया तो अगले कुछ वर्षों में स्थिति विकट हो जाएगी। तीन दिनों तक दून की सड़कों का अध्ययन करने के बाद इंस्टीट्यूट ऑफ रोड ट्रैफिक एजुकेशन (आईआरटीई) की टीम ने अपने प्रस्तुतीकरण में यह बात कही। संस्थान के निदेशक डॉ. रोहित बलूजा ने कहा कि हमें कुछ लांग टर्म प्लान के साथ शॉर्ट टर्म प्लान पर भी काम करना होगा। उन्होंने यातायात व्यवस्था में गड़बड़ी के कारण बताए और बेहतरी के लिए कई सुझाव दिए।
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यातायात अव्यवस्था के प्रमुख कारण
आईआरटीई की टीम ने शहर की सड़कों पर अतिक्रमण, उनकी खस्ता हालत, प्रमुख कार्यालयों और संस्थानों के एक जगह होने, लोगों में ट्रैफिक सेंस नहीं होने, यातायात कर्मियों की बेहतर ट्रेनिंग नहीं होने, यातायात कर्मियों की कम संख्या को यातायात अव्यवस्था का प्रमुख कारण माना।
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आईआरटीई के प्रमुख सुझाव
टीम ने शहर में किसी भी तरह के मल्टी यूनिट प्रोजेक्ट्स या कांप्लेक्स के निर्माण से पहले ट्रैफिक पुलिस से एनओसी अनिवार्य करने, स्कूल-कॉलेजों में छात्र-छात्राओं के लिए एक सप्ताह का अनिवार्य जागरुकता कार्यक्रम चलाने, वैकल्पिक सड़कें, फ्लाईओवर बनाने, मुख्य शहर के यातायात को वैकल्पिक सड़कों पर बांटने, बाहर के ट्रैफिक को बाहरी क्षेत्रों से निकालने जैसे कई सुझाव दिए।
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एक साल में 940 मौतें
पुलिस मुख्यालय के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2017 में प्रदेश में अलग-अलग स्थानों पर हुई सड़क दुर्घटना में 940 से ज्यादा लोगों की मौत हुई, जबकि 1600 से ज्यादा घायल हुए। अकेले दून में 140 से ज्यादा लोगों की मौत हुई और 250 से ज्यादा घायल हुए।