ब्यूरो/अमर उजाला, देहरादून
समीक्षा अधिकारी के पांच पदों की प्रोन्नति को लेकर शासन धर्म संकट की स्थिति में दिख रहा है। एक पक्ष का तर्क है कि मामला कोर्ट से ही निस्तारित होना चाहिए। दूसरे पक्ष की दलील है कि न्याय विभाग की सिफारिशें शासन में लंबित पड़ी हैं उन पर स्पष्ट निर्णय लेना चाहिए। कुल पांच लोगों की प्रोन्नति के इस मामले में पूरा सचिवालय संघ भी दो खेमों में बंट गया है।
जिन पांच लोगों की प्रोन्नति का मसला अधर में है उनमें से एक संजीव कुमार शर्मा का कहना है कि कई महीने से प्रोन्नति की फाइल शासन में अटकी पड़ी है। न्याय विभाग ने अपनी संस्तुति भी दे दी है। इसके बावजूद न जाने किस दबाव में शासन फैसला लेने में हिचक रहा है। उनका आरोप है कि पांच लोगों की प्रोन्नति में कई लोग ऐसे हैं जिनकी ग्रेडिंग पर असर पड़ सकता है। वहीं लोग प्रोन्नति की बात पर नियुक्ति को ही अनियमित करार देने की मुहिम छेड़े हुए हैं। संजीव शर्मा का कहना है कि प्रोन्नति मामले को विधानसभा में भी उठवाया जाएगा। चूंकि प्रोन्नति का मसला सिर्फ तीन लोगों का फंसा हुआ है, इसलिए हम अलग थलग पड़े हैं। सचिवालय संघ भी हमारे मामले में सकारात्मक रवैया नहीं अपना रहा है। पूरे मामले पर संजीव शर्मा का तर्क है कि उन्हें मर्सी पर नहीं बल्कि मेरिट के आधार पर नियुक्ति मिली है। लिहाजा प्रोन्नति नहीं देना अधिकारों के हनन की श्रेणी में आता है।