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प्राकृतिक जल स्त्रोतों के उद्धार को करोड़ों की दरकार

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ब्यूरो/ अमर उजाला, देहरादून।
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उत्तराखंड में विलुप्त होते प्राकृतिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने के लिए सरकार को करोड़ों रुपये की दरकार है। उत्तराखंड सरकार द्वारा कराए गए एक सर्वे में प्रदेश में 29 हजार प्राकृतिक जल स्त्रोत पाए गए है। जिनमें से 1048 विलुप्त होने की कगार पर है। सरकार ने प्रथम चरण में पांच हजार स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने का लक्ष्य रखा है। राज्य सरकार ने पेयजल निगम, जल संस्थान और स्वजल निगम को इन प्राकृतिक जल स्त्रोतों को पुर्नजीवित करने की संयुक्त जिम्मेदारी सौंपी है। इसके लिए पेयजल निगम की ओर से केंद्र सरकार को ढाई हजार करोड़ रुपये का प्रस्ताव बनाकर भेजा है।
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दरअसल, उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक आबादी प्राकृतिक जल स्त्रोताें पर निर्भर है। लेकिन रख रखाव के अभाव में यह प्राकृतिक जल स्त्रोत लगातार विलुप्त होते जा रहे है या फिर इन स्त्रोतों का डिस्चार्ज 50 से 90 फिसदी तक कम हो गया है। यही वजह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग पेयजल संकट से जूझ रहे है। हालांकि सरकारी एजेंसियां इन क्षेत्रों में जिला मुख्यालयों से पेयजल आपूर्ति करने का दावा करती है लेकिन इससे लोगों को पर्याप्त मात्रा में पानी नहीं मिल पाता। पेयजल निगम प्रबंधक निदेशक भजन सिंह ने बताया कि जल स्त्रोताें को पुर्नजीवित करने के लिए केंद्र सरकार को ढाई हजार करोड़ का प्रस्ताव भेज दिया गया है। पौधे लगाकर प्राकृतिक जल स्त्रोतों को जीवंत किया जाएगा। बजट मिलने के बाद पुर्नजीवित करने का काम शुरू कर दिया जाएगा। एक प्राकृतिक स्त्रोत पर करीब पांच लाख रुपये खर्च होगे।
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