इंजीनियर एमके सिंह हत्याकांड के सभी आठ आरोपियों को कोर्ट ने बृहस्पतिवार को बरी कर दिया। गवाही के बाद फैसला सुरक्षित रखा गया था। एक आरोपी की पहले ही मौत हो चुकी थी। ट्रायल के दौरान एक आरोपी फरार हो गया था।
सिंचाई विभाग के बाढ़ खंड में तैनात सहायक अभियंता एमके सिंह 2 अगस्त 2009 को मोहद्दीपुर के चार फाटक में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में आजमगढ़, किशुनदासपुर के रहने वाले उनके भाई अजय सिंह ने कैंट थाने में मुकदमा दर्ज कराया था। मोहद्दीपुर में परिवार के साथ रहने वाले एमके सिंह घटना वाले दिन रात आठ बजे चार फाटक के पास रहने वाले अभियंता बीपी सिंह से मिलने गए थे। बाहर निकलते समय बाइक सवार दो अज्ञात बदमाशों ने उनकी गोली मार कर हत्या कर दी। इस मामले में कैंट पुलिस ने बाढ़ खंड के सहायक अभियंता एके चौधरी, बेतियाहाता के रहने वाले अजीत शाही, गगहा के राउतपार निवासी पंकज शाही, शिवपुर सहबाजगंज के आशुतोष सिंह दीपक, पंकज लोचन मिश्रा, बेलीपार के चेरिया निवासी अजय उर्फ गुड्डू यादव, लालबहादुर यादव, इंदिरानगर निवासी संजय यादव व शशिभूषण के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की थी। सभी आरोपी गिरफ्तार कर जेल भेजे गए थे। बाद में जमानत पर रिहा हुए। लालबहादुर यादव की हत्या होने के बाद मुकदमे में उसका विचारण नहीं हुआ। एक अन्य अभियुक्त शशिभूषण ट्रायल के दौरान फरार हो गया और अब तक उसकी जानकारी नहीं मिल पाई है। शेष आरोपियों के मुकदमे की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाह मुकर गए। कोर्ट ने साक्ष्य के अभाव में सभी को बरी कर दिया।
फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेगा अभियोजन विभाग
अभियोजन विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर दलजीत सिंह चौधरी व मुकदमे के अभियोजन अधिकारी दयानंद प्रसाद ने बताया कि मुकदमे के सभी गवाह
पक्ष द्रोही हो गए थे इसलिए ऐसा फैसला आया है। अभियोजन अधिकारी ने बताया कि वह चार महीने से मुकदमे को देख रहे हैं इससे पहले ही गवाही पूरी हो चुकी थी। इसलिए उनके पास कोई मौका नहीं था। उन्होंने कहा कि फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील करेंगे।
गैंगवार की आशंका में कोर्ट परिसर में जमी रही फोर्स
इंजीनियर एमके सिंह की हत्या के चार साल बाद लालबहादुर यादव की हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड में तेरह आरोपी बनाए गए थे। इनमें आशुतोष सिंह दीपक व पंकज लोचन मिश्र भी आरोपी थे। गुड्डू यादव मुकदमे के वादी थे। अजीत शाही के लालबहादुर बेहद खास थे। इसलिए इनमें दो गुट बन गए। आठों आरोपी नामी गिरामी हैं और जरायम की दुनिया के चर्चित चेहरे हैं। दोनों गुटों के बीच आपस में रंजिश की तलवारें खिंच चुकी थीं। इसलिए आमने सामने होने पर गैंगवार की आशंका थी। एलआईयू ने पुलिस को यही रिपोर्ट दी थी। इसलिए फैसले के दिन परिसर में पर्याप्त मात्रा में फोर्स तैनात की गई थी। क्राइम ब्रांच, पीएसी के साथ कैंट इंस्पेक्टर पूरे दिन कचहरी में डटे रहे।