फिक्सिंग में पूरे मैच के फैसले को बदलने की संभावता होती है जबकि स्पॉट फिक्सिंग के दौरान कोई भी टीम या खिलाड़ी मैच के सिर्फ उस हिस्से में ही धांधली करता है जो स्पॉट फिक्स किया जाता है। मसलन ओवर की किसी गेंद पर जानबुझकर फेंकी गई वाइड-नो बॉल। या फिर जानबुझकर लुटाए गए रन। इसके अलावा, स्पॉट फिक्सिंग में कोई बल्लेबाज बुकी के कहे अनुसार एक ओवर में कोई रन नहीं बनाता है या कप्तान मैदान में कुछ ऐसे फैसले लेता है जो पहले से ही 'फिक्स' किए जा चुके हैं।
इसे एक उदाहरण के तौर से समझाते हैं। मान लीजिए किसी टीम ने टी-20 मुकाबले में पहले बल्लेबाजी करते हुए स्कोरबोर्ड पर 19 ओवर में 194 रन बना लिए। जाहिर सी बात है इस टीम के लिए 20वें ओवर में 200 रन का आंकड़ा बनाना कोई मुश्किल काम नहीं होगा।
खेल के इसी रोमांच का फायदा बुकी उठाते हैं। बुकी यहां सट्टा लगवाते हैं कि क्या खेल रही टीम 200 रन बना पाएगी। मैदान पर अच्छी बल्लेबाजी होते देख टीवी पर मैच देख रहे अधिकतर दर्शक 200 रन बनाने का सट्टा लगा लेते हैं।
तभी स्पॉट फिक्सिंग करवाने के लिए तैयार बैठे बुकी मैदान में खेल रहे क्रिकेटर्स को संदेश भिजवाते हैं कि उन्हें आखिरी ओवर में 6 या इससे अधिक रन नहीं बनाने हैं और नतीजतन बैटिंग कर रही टीम 199 रन का आंकड़ा नहीं पार करती। इससे न तो मैच का नतीजा प्रभावित होता है। न ही किसी को शक होता है और बुकी मुनाफा कमा जाते हैं।
मैच फिक्सिंग इससे एकदम अलग है। यहां बहुत से खिलाड़ियों का धांधली करना या कई बार पूरी की पूरी टीम का जानबूझकर हारना शामिल होता है। विश्व क्रिकेट में ऐसे कई मौके सामने आए जब फिक्सिंग की दलदल में कई खिलाड़ियों ने 'तालमेल' दिखाते हुए मैच के नतीजे को प्रभावित किया हो।
फिक्सिंग के इस दोनों ही रूप में कई भारतीय खिलाड़ियों का करियर चौपट हो चुका है। 2013 में जहां श्रीसंत, अंकित चव्हाण और अंकित चंदेला का करियर खत्म हुआ तो इसके पहले टी सुधींद्र, शलभ श्रीवास्तव, मॉनीश मिश्रा, अमित यादव और अभिनव बाली भी इसके शिकार हो चुके हैं।
दूसरी ओर 2000 में फिक्सिंग के जिन्न ने भारतीय क्रिकेट को खत्म कर दिया था। तत्कालीन दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोन्ये ने बुकी के साथ रिश्ते होने की बात मानी थी। जिसमें बाद में भारतीय कप्तान मोहम्मद अजहरूद्दीन, अजय जडेजा, नयन मोंगिया, अजय शर्मा और मनोज प्रभाकर सरीखे दिग्गज भी फंसे थे।