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Prithvi Shaw: पिता ने बेटे का सपना पूरा करने के लिए दुकान तक बेची, ऐसा है पृथ्वी शॉ के क्रिकेटर बनने का सफर

Thu, 16 Feb 2023 07:29 PM IST
अभिषेक दीक्षित न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इस युवा बल्लेबाज को टेस्ट में डेब्यू करने का मौका अक्तूबर 2018 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मिला था। 18 वर्षीय बल्लेबाज ने अपने डेब्यू टेस्ट में शतक जमाकर कीर्तिमानों की झड़ी लगा दी थी। मुंबई के बल्लेबाज के लिए टीम इंडिया तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था।
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पृथ्वी शॉ - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारतीय क्रिकेटर पृथ्वी शॉ अपने खेल से ज्यादा विवादों को लेकर सुर्खियों में रहते हैं। इस बार वे अपनी महिला फैन से हाथापाई को लेकर सुर्खियों में हैं। पृथ्वी का आरोप है कि सेल्फी लेने के लिए मना करने पर कुछ फैंस भड़क गए और उनके दोस्त की कार पर हमला कर दिया। पुलिस ने आठ लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। आइए जानते हैं पृथ्वी शॉ के बारे में...

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अक्तूबर 2018 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मिला था पहला मौका
इस युवा बल्लेबाज को टेस्ट में डेब्यू करने का मौका अक्तूबर 2018 में वेस्टइंडीज के खिलाफ मिला था। 18 वर्षीय बल्लेबाज ने अपने डेब्यू टेस्ट में शतक जमाकर कीर्तिमानों की झड़ी लगा दी थी। मुंबई के बल्लेबाज के लिए टीम इंडिया तक पहुंचने का सफर आसान नहीं था। उन्होंने कई समझौते किए और परेशानियों का भी सामना किया, जिसके बाद उन्हें भारतीय टीम की कैप पहनने का मौका मिला।

चार साल में मां को खोने के बाद भी करते रहे मेहनत
पृथ्वी शॉ का जन्म 9 नवंबर 1999 को हुआ था। पृथ्वी सिर्फ चार साल के थे, जब उन्होंने अपनी मां को खो दिया। पृथ्वी के पिता पंकज के लिए यह बड़ा झटका था, क्योंकि वह अपनी पत्नी से बहुत मोहब्बत करते थे। हालांकि, पंकज ने अपनी पूरी उर्जा पृथ्वी और क्रिकेट में झोंक दी। पंकज ने अपनी पत्नी के गुजर जाने के बाद जल्द ही पृथ्वी को क्रिकेट एकेडमी में डाला और अपनी पूरी जिंदगी बेटे के सपने को पूरा करने के नाम कर दी। पृथ्वी बचपन से ही सपना देखते थे कि एक दिन टीम इंडिया का प्रतिनिधित्व करेंगे।
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विरार से बांद्रा तक का सफर
पृथ्वी के पिता सुबह साढ़े तीन बजे उठकर बेटे के लिए नाश्ता बनाते थे। सुबह साढ़े चार बजे पिता और बेटे विरार से बांद्रा के एमआईजी ग्राउंड जाते थे, जहां पृथ्वी अभ्यास करते थे। इस दौरान पृथ्वी अपने पिता के कंधें पर बैठते थे। पृथ्वी जहां पूरे दिन अभ्यास करते थे, वहीं उनके पिता पेड़ की छांव में बेटे के खेल पर नजर रखते थे। पूरे दिन अभ्यास करने के बाद पृथ्वी और उनके पिता शाम को घर पहुंचते थे। डिनर करने के बाद दोनों शाम साढ़े 9 बजे तक सो जाते थे। यह पृथ्वी शॉ का रूटीन बन चुका था और कड़ी मेहनत का फल उन्हें चार अक्तूबर 2018 को मिला।

बेटे के लिए पिता ने समर्पित ने किया जीवन
पृथ्वी के पिता ने कपड़ो की दुकान खोली थी, जो सूरत और बड़ौदा तक लोकप्रिय भी हो चुकी थी। हालांकि, पृथ्वी के क्रिकेट खेलने के सपने को सच करने के लिए पंकज ने अपनी दुकान बेच दी। इसकी वजह से वह पृथ्वी को ट्रेनिंग दिलाने में सक्षम हुए और उनके साथ पूरे समय रह भी सके। एक तरह से देखा जाए तो पंकज ने अपनी पूरी जिंदगी पृथ्वी के नाम कर दी। पिता ने अपने करियर और निजी जिंदगी से समझौता किया, ताकि बेटे के सपने को पूरा होते देख सकें।  पिता-बेटे के पास पैसों की कमी रही, लेकिन दोनों ने शांति बनाए रखी और उम्मीद जताई कि क्रिकेट एक दिन उनकी कड़ी मेहनत को सार्थक करेगा। पृथ्वी और उनके पिता मुंबई की एक छोटी सी चौल में रहते थे।

कभी नहीं ली छुट्टी
पृथ्वी शॉ ने बचपन से कभी छुट्टी नहीं ली। उनका हर एक दिन क्रिकेट के लिए समर्पित रहा। पृथ्वी और उनके पिता ने कभी परिवार से मिलने के लिए छुट्टी नहीं ली। जब पृथ्वी का जन्मदिन हो या फिर पृथ्वी ने बेहतरीन पारी खेली हो तो वो अपने पिता के साथ बाहर जाकर चाइनीस फूड खाते थे। पृथ्वी और उनके पिता ने अपनी सभी छुट्टियों से समझौता किया।

पूरे दिन नेट्स पर बल्लेबाजी का अभ्यास करना
भले ही पंकज के परिवार का बैकग्राउंड क्रिकेट का नहीं रहा हो, लेकिन उन्होंने गेंदबाजी करना सीखा था, ताकि बेटे को ज्यादा से ज्यादा बल्लेबाजी का अभ्यास करा सके। गर्मी के दिनों में जब गेंदबाज थक जाते थे, तो पंकज अपने बेटे को गेंदबाजी करते थे। पिता बेटे ने पूरा समय अपनी मेहनत में लगाया, जिससे पृथ्वी बेहतर क्रिकेटर बनकर उभरे और देश के लिए खेलने के अपने को पूरा कर सके।

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