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क्रिकेट से राजनीति की पिच तकः संन्यास के 6 महीने के अंदर ही बन गए मंत्री

Sun, 29 May 2016 12:09 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, नई दिल्ली
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- फोटो : PTI
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इस तरह की खबर सुनने को कम ही मिलती हैं कि किसी क्रिकेटर को क्रिकेट छोड़े सिर्फ 6 महीने हुए हों और राजनीति के मैदान पर उतरे फिर मंत्री भी बन जाए।
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ऐसा ही कुछ हुआ है पश्चिम बंगाल में जब क्रिकेट से संन्यास लेने के 6 महीने के अंदर ही टीम इंडिया के पूर्व क्रिकेटर लक्ष्मी रतन शुक्ला ने राजनीति में आने का फैसला लिया और फिर चुनाव जीत भी गए, इसके बाद वह ममता बनर्जी के 42 सदस्यीय नई केबिनेट में मंत्री भी बन गए।

ऑलराउंडर लक्ष्मी रतन शुक्ला ने बंगाल के लिए 18 साल खेलने के बाद अपने प्रथम श्रेणी क्रिकेट को विराम दे दिया था। इस धाकड़ क्रिकेटर ने आज शुक्रवार को पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में ममता बनर्जी के दूसरी बार मुख्यमंत्री पद के लिए शपथ लेने के बाद मंत्री पद की शपथ ली।
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35 साल के शुक्ला के लिए क्रिकेट के मैदान से राजनीति में स्विफ्ट करने का फैसला पूरी तरह से सही साबित हुआ। वह पहली बार बंगाल विधानसभा चुनाव के जरिए राजनीति के अखाड़े में उतरे और बड़े अंतर से जीत हासिल करने में कामयाब भी रहे।

उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर हावड़ा (उत्तर) की सीट से जीत हासिल की थी। इस सीट पर उन्होंने 26,959 मतों के अंतर से कांग्रेस के संतोष कुमार पाठक और बीजेपी नेता रूपा गांगुली को हराकर जीत हासिल की थी। गांगुली एक मशहूर अभिनेत्री रही हैं और वह महाभारत में द्रौपदी की भूमिका में काफी शोहरत बटोर चुकी हैं।
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वीरेंद्र सहवाग और हरभजन के साथ ही चर्चा में आए थे लक्ष्मी रतन

- फोटो : PTI
पूर्व क्रिकेटर शुक्ला हावड़ा के ही रहने वाले हैं। वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह और मोहम्मद कैफ जैसे खिलाड़ियों के साथ 1998 में अंडर-19 वर्ल्ड कप हिस्सा लेने वाले शुक्ला का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर ज्यादा लंबा नहीं चला। 1999 में उन्हें 3 वनडे मैच खेलने का मौका मिला।

प्रथम श्रेणी क्रिकेट में शुक्ला ने दिसंबर, 2015 में संन्यास लेने से पहले बंगाल के लिए 137 प्रथम श्रेणी मैचों में 6217 रन बनाए और 172 विकेट भी झटके थे। साथ ही 141 लिस्ट-ए मैचों में 2997 रन बनाए और 143 बल्लेबाजों को अपना शिकार बनाया।

शुक्ला 2011-12 रणजी ट्रॉफी जीतने वाली बंगाल टीम के सदस्य रहे और उनकी इस खिताबी जीत में अहम भूमिका भी रही। बंगाल ने 1989-90 के बाद पहली बार यह खिताब जीता था। वह बंगाल के पहले क्रिकेटर बने जिन्होंने 100 रणजी मैच खेले हों। 
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