इंग्लैंड के खिलाफ घरेलू मैदानों पर लगातार दो टेस्ट मैच गंवाने के बाद टीम इंडिया की चौतरफा आलोचना हो रही है।
भारतीय सिलेक्टरों ने नागपुर में होने वाले अंतिम टेस्ट मैच के लिए पीयूष चावला, रवींद्र जडेजा और परविंदर अवाना का चयन कर मनोबल खो चुकी कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की टीम में जान डालने की कोशिश की है।
मुंबई और कोलकाता की हार का ठीकरा फोड़ा गया है युवराज सिंह, जहीर खान और हरभजन सिंह के सिर। लेकिन भारतीय क्रिकेट के इस बुरे दौर के लिए टीम के कोच डंकन फ्लेचर की तनिक भी जवाबदेही तय नहीं की गई है।
दिलचस्प बात यह है कि इन्हीं फ्लेचर की निगरानी में 1999 से 2007 तक इंग्लैंड की टीम ने बुलंदी को छुआ और इन्हीं के कार्यकाल में भारत ने टेस्ट क्रिकेट में बादशाहत गंवा दी।
कोच फ्लेचर के कार्यकाल में टीम इंडिया ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड में खेली गई टेस्ट सीरीज में बुरी तरह नाकाम रही। टी-20 विश्वकप में भारत का सफर सेमीफाइनल तक भी नहीं पहुंच पाया।
गौरतलब है कि डंकन फ्लेचर को गैरी कर्स्टन के कोच पद छोड़ने के बाद भारतीय टीम की कमान सौंपी गई थी। इन्हें नियुक्त करने की राय भी खुद कर्स्टन ने ही दी थी।
लेकिन गैरी की कोचिंग में भारत ने जहां विश्वकप का खिताब जीता, डंकन की कोचिंग में इसका प्रदर्शन गिरता ही चला गया।
लगभग 18 महीने के अपने कार्यकाल में फ्लेचर टीम पर तनिक भी प्रभाव नहीं छोड़ पाए।
कोच फ्लेचर की टीम इंडिया के चयन और अभ्यास में कितनी भूमिका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मौजूदा सीरीज के पहले दो टेस्ट मैचों के लिए जब टीम चुनी गई थी तो वे सिलेक्टर्स की बैठक में शामिल भी नहीं थे।
सीरीज के पहले आयोजित अभ्यास शिविर में भी फ्लेचर नहीं पहुंच पाए थे।