फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इस तरह गेंदबाज से विकेटकीपर-बल्लेबाज बने दिनेश कार्तिक, पिता थे इनके पहले क्रिकेट कोच

Sat, 24 Mar 2018 11:39 AM IST
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 5
dinesh karthik
भारतीय टीम में प्रतिस्पर्धा इतनी ज्यादा है कि हर बार जब आप एक अवसर प्राप्त करते हैं, तो आपको अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करने की आवश्यकता होती है। टीम से दूर रहने के बावजूद क्रिकेट के प्रति मेरे जुनून में कभी कमी नहीं आई।

एक जून, 1985 को मेरा जन्म चेन्नई में हुआ था। मेरे पिता कुवैत में बतौर सिस्टम एनालिस्ट काम करते थे और मैं नौ साल की उम्र में भारत से कुवैत चला गया था। उस दौरान मेरी पढ़ाई उसी खाड़ी देश में हुई। मेरे पिता भी चेन्नई के प्रथम श्रेणी क्रिकेट खिलाड़ी रह चुके हैं। जब मेरा रुझान क्रिकेट की ओर बढ़ रहा था, तभी मेरे पिता ने मुझे खेल के बजाय पढ़ाई पर ज्यादा ध्यान देने की सलाह दी, क्योंकि मेरे पिता को आशंका थी कि कहीं उनके बेटे का क्रिकेट करियर भी उनकी तरह प्रथम श्रेणी तक ही न सीमित रह जाए। लेकिन यह भी सच्चाई है कि बचपन में उन्हीं के प्रशिक्षण ने मुझे अच्छा बल्लेबाज बनने में मदद की।
विज्ञापन

2 of 5
dinesh karthik
मां का साथ मिला
मात्र बारह साल की उम्र में अंडर-19 गल्फ भारतीय टीम के लिए खेलने के बाद अपने खेल में सुधार के उद्देश्य से मैं भारत आ गया। मेरे भारत आने के बाद भी मेरे पिता कुवैत में थे, पर मेरी मां चेन्नई में मेरे साथ रहती थीं। वह तेल एवं प्राकृतिक गैस आयोग में नौकरी करती थीं।

उनके साथ से मुझे हमेशा नैतिक समर्थन मिला, क्योंकि वह जानती थीं कि किसी खिलाड़ी को शरीर के साथ मानसिक रूप से कितना मजबूत होना चाहिए। वह खुद एक टेबल टेनिस खिलाड़ी रह चुकी हैं और उनके लिए यह स्वीकार करना बहुत आसान था कि उनका बेटा अपने पिता के पदचिह्नों पर चलकर क्रिकेटर बनना चाहता था।
विज्ञापन

3 of 5
दिनेश कार्तिक
कभी गेंदबाज भी था
बचपन में हम मां को मिले उनकी कंपनी के क्वार्टर में रहते थे। आस-पड़ोस के साथी बच्चों के साथ मैं प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेलता था। उस वक्त मेरे पिता सभी बच्चों को गेंदबाजी कराते थे। पिता जी ही सबके कोच थे और अंपायर की भूमिका भी उन्हीं की होती थी। सात साल की उम्र में क्रिकेट के क्षेत्र में मैंने पहला पुरस्कार जीता था। उस वक्त मैं बल्लेबाजी करने के साथ ही दाएं हाथ से गेंद फेंकने वाला स्पिन गेंदबाज भी था।

4 of 5
dinesh karthik
और उस दिन से विकेटकीपर बन गया
क्रिकेट में छा जाने की उम्मीद लिए, जब मैं चेन्नई के डॉन बॉस्को स्कूल में पढ़ाई कर रहा था, तो एक दिन स्कूली क्रिकेट मैच में विकेटकीपिंग करने वाला खिलाड़ी नहीं आया। उस दिन मुझे गेंदबाजी के बजाय दस्ताने पहनकर विकेट के पीछे खड़ा होना पड़ा। जिन लोगों ने भी मुझे उस दिन खेलते देखा, उनका यही कहना था कि मैं गेंद पकड़ने में ज्यादा बेहतर हूं, बजाय गेंद फेंकने के।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
Dinesh Karthik
बनाए रखा धैर्य
मुझे पहली अंतरराष्ट्रीय ख्याति 2004 में मिली, जब मैंने बांग्लादेश में आयोजित अंडर-19 विश्व कप में श्रीलंका के खिलाफ मैच जिताऊ पारी खेली थी। करियर के कई मौकों पर मुझे चुनौतियों का सामना करना पड़ा। भारतीय टीम से लंबे वक्त तक बाहर रहने के बावजूद क्रिकेट के प्रति मेरे जुनून में कभी कमी नहीं आई। बांग्लादेश के खिलाफ हाल के मैच में आखिरी गेंद पर छक्का लगाने से पहले मैं यही सोच रहा था कि मुझे बल्ले से गेंद के संपर्क को सही रखना है और यदि ऐसा हुआ, तो गेंद सीमा रेखा के बाहर ही जाएगी।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें