सौरव गांगुली और महेंद्र सिंह धोनी। ये सिर्फ दो नाम नहीं है बल्कि भारतीय क्रिकेट की पहचान है। 'दादा' ने जहां हाशिए पर चल रही टीम को संवारा। नए खिलाड़ी तलाशे, उन्हें लड़ना सिखाया तो महेंद्र सिंह धोनी ने उस प्लेइंग इलेवन में जान फूंककर कामयाबी की बुलंदी तक पहुंचाया, इसे संयोग कहा जाए या किस्मत का फेर। अलग-अलग समय पर टीम की कमान संभालने वाले दोनों ही चैंपियन ईस्ट जोन से आते थे। जब गांगुली का सूरज अस्त हुआ तो टीम इंडिया की गद्दी रांची का यह राजकुमार संभाल रहा था और जब आज जब वो विदा हुए तो गांगुली बीसीसीआई के बॉस हैं।
सौरव गांगुली ने कई बार खुले मंच पर कहा कि तत्कालीन कोच ग्रेग चैपल ने उन्हें भारतीय टीम से बाहर किया। अपनी आत्मकथा 'ए सेंचुरी इज नॉट इनफ' में उन्होंने इसका जिक्र भी किया है। चैपल के कार्यकाल में न सिर्फ उन्हें कप्तानी गंवानी पड़ी बल्कि टीम से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। चयनकर्ताओं का इशारा भी साफ था कि 100 से अधिक टेस्ट मैच खेल चुके सौरव को संन्यास ले लेना चाहिए। क्रिकेट इतिहास गवाह है कि दादा ने न सिर्फ वापसी की बल्कि अपनी अंतिम श्रृंखला में शानदार प्रदर्शन भी किया। 2008 में मोहाली में शतक जमाया और नागपुर में करीबी अंतर से चूके। ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ जारी उस टेस्ट मैच में कप्तान धोनी के एक फैसले से दादा हैरान भी रह गए थे। मैच के आखिरी पलों में धोनी ने सौरव गांगुली से टीम इंडिया की कप्तानी करने को कहा था। धोनी चाहते थे कि गांगुली बतौर कप्तान ही विदा ले। धोनी के इस व्यवहार को मौजूदा बीसीसीआई अध्यक्ष आज भी याद करते हैं।
'वह देश और विश्व क्रिकेट के धुरंधर हैं। खेल के छोटे प्रारूप में उनके नेतृत्व कौशल की तुलना करना नामुमकिन। वह नैसर्गिक प्रतिभा के धनी हैं। आपके करियर के शुरुआती दौर में एकदिवसीय क्रिकेट की बल्लेबाजी से हर कोई प्रभावित था। हर अच्छी चीज का अंत होता है और यह पूरी तरह से शानदार रहा है, उन्होंने आने वाले विकेटकीपर्स के लिए मानक तय किए हैं, उन्हें मैदान से विदा लेने पर कोई पछतावा नहीं होगा। एक उत्कृष्ट करियर। मैं उन्हें जीवन में शुभकामनाएं देता हूं।'