भारतीय क्रिकेट में फिटनेस को लेकर एक बड़ा बदलाव किया गया है। अब ब्रोंको टेस्ट (Bronco Test) तेज गेंदबाजों के लिए अनिवार्य फिटनेस पैमाना बनेगा। यह पहल भारतीय टीम के स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच एड्रियन ले रूक्स के सुझाव पर लागू की गई है। हाल फिलहाल में देखा गया है कि भारतीय तेज गेंदबाज लंबे समय तक चोट से जूझते रहे हैं। इस साल आईपीएल से पहले तक कई मुख्य तेज गेंदबाज चोटिल थे। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, अब उनके स्टैमिना को बढ़ाने और उन्हें लंबे समय तक फिट रखने के लिए यह टेस्ट अनिवार्य किया गया है।
कौन हैं ले रूक्स?
ले रूक्स जून में भारतीय टीम से स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग कोच के रूप में जुड़े। वह जनवरी 2002 से मई 2003 तक भी भारतीय टीम के साथ इसी पद पर काम कर चुके हैं। इसके अलावा उन्होंने क्रिकेट दक्षिण अफ्रीका और आईपीएल टीमों कोलकाता नाइट राइडर्स तथा पंजाब किंग्स के साथ भी काम किया है।
ब्रोंको टेस्ट क्या है?
यह टेस्ट रग्बी से लिया गया है और खिलाड़ियों की एरोबिक क्षमता और रनिंग स्टैमिना को जांचने के लिए बनाया गया है। इसमें खिलाड़ी को एक सेट में 20 मीटर, 40 मीटर और 60 मीटर की शटल रन पूरी करनी होती है। कुल पांच सेट (1200 मीटर) लगातार यानी बिना रुके पूरे करने होते हैं और इसके लिए अधिकतम समय छह मिनट तय है। यह टेस्ट पहले से मौजूद यो-यो टेस्ट और दो किलोमीटर टाइम-ट्रायल के साथ मिलकर खिलाड़ियों की फिटनेस का मूल्यांकन करेगा।
ले रूक्स और भारतीय टीम
- फोटो : ANI
क्यों लाया गया ब्रोंको टेस्ट?
हाल ही में पांच मैचों की टेस्ट सीरीज में भारतीय गेंदबाजों की फिटनेस चिंता का विषय रही थी। केवल मोहम्मद सिराज ऐसे गेंदबाज थे जिन्होंने सभी मैच खेले। जसप्रीत बुमराह और आकाश दीप को आराम देना पड़ा था। अर्शदीप सिंह भी अभ्यास सत्र के दौरान चोटिल हुए थे। वहीं, बुमराह दौरे पर अपने तीसरे टेस्ट के दौरान धीमे भी हो गए थे। उनकी गति नीचे आ गई थी। ऐसे में कोचिंग स्टाफ का मानना है कि खिलाड़ी जिम में ज्यादा समय बिता रहे हैं, जबकि असली चुनौती मैदान पर लगातार दौड़ने और पारी दर पारी गेंदबाजी करने की है। इस टेस्ट से यह सुनिश्चित होगा कि तेज गेंदबाज लंबे स्पेल तक थकान झेले बिना अपनी गेंदबाजी की गति बनाए रख सकें।
दो किमी टाइम-ट्रायल क्या है?
ब्रोंको टेस्ट से पहले खिलाड़ियों को दो किलोमीटर की दौड़ का टाइम-ट्रायल देना होता था। तेज गेंदबाजों के लिए तय बेंचमार्क है: आठ मिनट 15 सेकंड। वहीं, बल्लेबाजों, विकेटकीपरों और स्पिनरों के लिए बेंचमार्क है: 8 मिनट 30 सेकंड। यानी इस समय सीमा के भीतर दो किमी दौड़ पूरी करना ही टेस्ट पास करने की शर्त है।
यो यो टेस्ट
- फोटो : BCCI
यो-यो टेस्ट से ब्रोंको टेस्ट कितना अलग?
अब तक भारतीय टीम की फिटनेस जांच के लिए यो-यो टेस्ट को अहम माना जाता था। इसमें खिलाड़ियों को 20-20 मीटर की दूरी पर रखे गए मार्कर्स के बीच लगातार दौड़ना होता है। हर 40 मीटर दौड़ के बाद 10 सेकंड का ब्रेक मिलता है, और धीरे-धीरे गति बढ़ती जाती है। भारतीय टीम के लिए न्यूनतम स्तर 17.1 तय किया गया था। लेकिन अब ब्रोंको टेस्ट के आने से फोकस केवल स्पीड या चुस्ती पर नहीं बल्कि खिलाड़ियों की लंबी दूरी तक दौड़ने की क्षमता और सहनशक्ति पर होगा। खासकर तेज गेंदबाजों के लिए यह और भी मुश्किल साबित हो सकता है क्योंकि उन्हें मैच में लंबे स्पेल तक निरंतर तेज दौड़ के साथ गेंदबाजी करनी पड़ती है। यो-यो टेस्ट जहां स्प्रिंट फिटनेस नापता था, वहीं ब्रोंको टेस्ट खिलाड़ियों की मैदान पर टिके रहने और लंबी दूरी तक रनिंग क्षमता की परीक्षा लेगा।
बढ़ा हुआ रनिंग फोकस क्यों जरूरी?
ले रूक्स का मानना है कि तेज गेंदबाजी केवल ताकत पर नहीं, बल्कि स्टैमिना और एरोबिक एंड्योरेंस पर आधारित होती है। ब्रोंको टेस्ट की डिजाइन खिलाड़ियों को बार-बार स्प्रिंट करने और तुरंत रिकवरी की क्षमता विकसित करने में मदद करती है। यह खेल के दबाव में भी गेंदबाज को ऊर्जा स्तर बनाए रखने में सहायक होगा। बीसीसीआई ने पहले ही कुछ कॉन्ट्रैक्टेड खिलाड़ियों को बंगलूरू स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में यह टेस्ट कराया है। इसका मुख्य उद्देश्य खिलाड़ियों के लिए एक स्पष्ट फिटनेस मानक तय करना है।
बुमराह, आकाश दीप और सिराज
- फोटो : BCCI
आगे की रणनीति
भविष्य में यह भारतीय क्रिकेटरों की फिटनेस का कड़ा मानक साबित होगा। ब्रोंको टेस्ट भारतीय क्रिकेट में फिटनेस को लेकर नए युग की शुरुआत है। बोर्ड का ध्यान अब तेज गेंदबाजों को केवल ताकतवर नहीं, बल्कि लगातार दौड़ने में सक्षम और लंबे समय तक टिके रहने वाला बनाने का है। यह बदलाव भारतीय तेज गेंदबाजी आक्रमण को और धारदार बनाएगा और टीम को लंबी सीरीजों में बढ़त दिलाने में मदद करेगा।